पृष्ठ:मेरी आत्मकहानी.djvu/१८

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
मेरी आत्मकहानी
११
 


लगा। दस ही वर्ष की अवस्था में मेरा विवाह हो गया। इसके अनंतर अँगरेजी की पढ़ाई आरंभ हुई। मेरे पिता के मित्र हनुमानप्रसाद थे, जो लँगड़े मास्टर के नाम से प्रसिद्ध थे। वे वेसलियन मिशन स्कूल में, जो नीचीबाग में था, पढ़ाते थे। वहाँ मेरी अँगरजी की शिक्षा आरंभ हुई। थोड़े दिनों के अनंतर इन मास्टर साहब की मिश्नरी इंसपेक्टर से बिगड़ गई। उन्होंने स्कूल की नौकरी छोड़ दी और ब्रह्मनाल में शिवनाथसिंह की चौरी के पास अपना स्कूल खोला। इर्द-गिर्द के लड़के पढ़ने आने लगे और स्कूल चल निकला। कुछ काल के उपरांत यहाँ से हटकर स्कूल गनीकुआँ पर गया और वहां पर उसका नाम हनुमान-सेमिनरी पड़ा। मास्टर हनुमानप्रसाद कुछ विशेष पढ़े-लिखे न थे, पर छोटे लड़कों को पढ़ाने का उनका ढंग बहुत अच्छा था। यहाँ से मैंने मन् १८९० में एँग्लोवर्नाक्यूलर मिडिल परीक्षा पास की।

बाबू गदाधरसिंह मिर्जापुर में सिरिश्तेदार थे। उन्हें हिंदी से प्रेम था। कई बँगला पुस्तकों का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया था। उन्होंने हिंदी-पुस्तकों का एक पुस्तकालय 'आर्य-भाषा-पुस्तकालय' के नाम से खोल रखा था। केवल दो आलमारियाँ पुस्तकों की थी, पर नई पुस्तकों के खरीदने आदि का सब व्यय बाबू गदाधरसिंह अपनी जेब से देते थे। यह पुस्तकालय हनुमान-सेमिनरी में आया और इसी संबंध में बाबू गदाधरसिंह से मेरा परिचय हुआ। इस स्कूल में रामायण का नित्य पाठ होता था। यहीं मानो मेरे हिंदी-प्रेम की नींव रखी गई। बीच में लगभग एक महीने तक लंडन मिशन