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मेरी आत्मकहानी
 

सन् १९२४ मे कोश के संबंध में एक हानिकारक दुर्घटना हो गई थी। आरंभ में शब्द-संग्रह के लिये जो स्लिपें तैयार हुई थी. उनके २२ मंडल कोश कार्यालय से चोरी चले गए। उनमे" विवो्क' से "शं" की और "शय से "सही". तक की स्लिपें थी। इसमे कुछ दोहराई हुई पुरानी स्लिपें भी थी जो छप चुकी थी। इन स्लिपो के निकल जाने से वो कोई विशेष हानि नहीं हुई, क्योंकि सब छप चुकी थी। परंतु शब्द-संग्रहवाली लिपो के चोरी हो जाने से अवश्य ही बहुत बड़ी हानि हुई । इनके स्थान पर फिर से कोशो आदि से शब्द एकत्र करने पड़े। यह शब्द-संग्रह अपेक्षाकृत थोड़ा और अधूरा हुआ और इसमें स्वभावत. ठेठ हिंदी या कविता आदि के उतने शब्द नहीं पा सके जितने आने चाहिए थे, और न प्राचीन काव्य-ग्रंथों आदि के उदाहरण ही सम्मिलित हुए। फिर भी जहाँ तक हो सका इस त्रुटि की पूर्ति करने का उद्योग किया गया और परिशिष्ट में बहुत-से छूटे हुए शब्द आ भी गए हैं।

सन् १९२स में कार्य शीघ्र समाप्त करने के लिये कोश-विभाग में दो नए महायक अस्थायी रूप से नियुक्त किए गए एक तो कोश के भूतपूर्व संपादक बाबू जगन्मोहन वर्मा के सुपुत्र बाबू सत्यजीवन वर्मा. एम० ए० और दूसरे पंडित अयोध्यानाथ शर्मा एम० ए०। यद्यपि ये सज्जन कोश-विमाग में प्राय एक ही वर्ष रहे थे. परंतु फिर भी इनसे कोश का कार्य शीघ्र गोत्र समाप्त करने में और विशेषत. व, श.प तथा म के शब्दों के सपादन में अच्छी सहायता मिली। जय ये दोनो सज्जन सभा से सबंध त्यागकर चले गए तब संपादन-कार्य