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मेरी आत्मकहानी
 

(२)यज्ञोपवीत-

पंद्रह सै एकसठ माघ सुदी।
तिथि पंचमी औ भृगुवार उदी।
सरयू तट विप्रन यज्ञ किए।
द्विज बालक कहँ उपवीत दिए।।


(३)विवाह-

पंद्रह सै पार तिरासि विषै।
शुभ जेठ सुदी गुरु तेरस पै।
अधराति लगै जु फिरि भँवरी।
दुलहा दुलही की पड़ी पँवरी॥


(४)स्त्री-वियोग-

सत पंद्रह युक्त नवासि सरै।
सु अषाढ़ बदी दसमीहुँ परै।
बुधवासर धन्य सो धन्य घरी।
उपदेसि सती तनु त्याग करी॥


(५)राम-दर्शन-

सुखद अमावस मौनिया,बुध सोरह सै सात।


(६)सूरदास से भेंट-

सोरह सै सौरह लगे,कामद गिरि ढिग वास।
शुभ एकांत प्रदेश महँ,आये सूर सुदास।।