पृष्ठ:मुद्राराक्षस.djvu/१४९

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मुद्राराक्षस ना -- राक्षस-(घबड़ाकर.) हाय ! हाय ! चित्रवर्मादिक साधु सब व्य मारे गए ! हाय ! राक्षस की सब चेष्टा शत्र को नहीं, मित्रों हो के ना करने को होती है। अब हम मंदभाग्य क्या करें ? जाहिं तपोवन, पै न मन शांत होत सह क्रोध । प्रान देहिं रिपु के जियत, यह नारिन को बोध ॥ खींचि खड्ग कर पतंग सम जाहिं अनल-अरि पास । .. पै या साहस होइहै चंदनदास-बिनास ॥ [ सोचता हुआ जाता है। इति पंचमांक छठा अंक स्थान-नगर के बाहर [कपड़ा गहना पहिने हुए सिद्धार्थक आता है ] सिद्धार्थक- बलद नील-तन जयति जय केशव केशी-काल । जयति सुजन-जन दृष्टि ससि चंद्रगुप्त नरपाल ॥ जयति आर्य चाणक्य की नीति सहज बलभौन । बिनही साजे सैन नित जीतति अरि-कुल जौन ॥ चलो आज पुराने मित्र समिद्धार्थक से भेंट करें (घूमकर ) अरे मित्र समिद्धार्थ के आप ही इधर अाता है। [समिद्धार्थ क आता है। ] समिद्धार्थक- मिटत ताप नहिं पान सों, होत उछाह बिनास । बिना मौत के सुख सबै औरहु करत उदास ॥ सुना है कि मलय केतु के कटक से मित्र सिद्धार्थक या गया उसी को खोजने को हम निकले हैं कि मिले तो बड़ा पानंद ई (आगे बढ़कर ) अहा ! सिद्धार्थ क तो यही है।