पृष्ठ:मुद्राराक्षस.djvu/११८

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तृतीय अंक संभालें और सब सेना की जड़ हाथी घोड़े ही हैं वैसे ही हिंगु ३१० रात और बलगुप को कौन प्रसन्न कर सकता है ? क्योंकि उनको सब राज्य पाने से भी संतोष न होगा । राजसेन और भागुरायण तो धन और और प्राण के डर से भागे हैं, वे तो प्रसन्न होई नहीं सकते। रोहितान तथा विजयवर्मा का तो कुछ पूछना हो नहीं है, क्योंकि वे तो और नातेदारों के मान से जलते हैं। उनका कितना भी मान करो, उन्हें थोड़ा ही दिखलाता है । तो इसका क्या आय है ? यह तो अनु- ग्रह का वर्णन हुआ। अब दंड का सुनिए । यदि हम प्रधान पद पाकर इन सबों को जो बहुत दिनों से नंदकुल के सर्वदा शुभाकांक्षी और साथी रहे दंड देकर दुखी करे तो नंदकुल के साथियों का हम पर से विश्वास उठ जाय । इससे हमने इन्हें छोड़ ही देना योग्य ३२० सममा । सो इन्हीं सब हमारे भृत्यो को पक्षपातो बनाकर राक्षस के उपदेश से मच्छराज की बड़ी सहायता पाकर और अपने पिता के वध से क्रोधित होकर पर्वतक का पुत्र कुमार कलय केतु हम लोगों से लड़ने को उद्यत हो रहा है । सो यह डाई के उद्योग का समय है, उत्सव का समय नहीं। इससे गढ़ के संस्कार के समय कौमुदी महोत्सव क्या होगा? यही सोचकर उसका प्रतिषेध कर दिया। चंद्रगुप्त भाय ! मुझे इसमें बहुत कुछ पूछना है। चाणक्य-ली भांति पूछो, क्योंकि मुझे भी बहुत कुछ कहना है। चंद्रगुप्त -यह पूछता हूँ- चाणक्य-हा ! मैं भा कहता हूँ। चंद्रगुप्त-कि हम लोगों के सब अनर्थों की जड़ मलयकेतु है। उसे आनन भागते समय क्यों नहीं पकड़ा। चाणक्य-वृषल ! मलयकेतु के भागने के समय भी दो ही उपाय थे-या तो मेल करते या दंड देते ।जो मेज करते तो श्राधा राज देना पड़ता और जो दड देते तो फिर यह हम लोगों की कृतघ्नता सब पर प्रसिद्ध हो जाती कि इन्हीं लोगों ने पर्वतक को भी मरवा डाला। आधा राज देकर जो प्रब मेल कर ले तो उस बेचारे