पृष्ठ:मुद्राराक्षस.djvu/११२

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तृतीय अंक ___कंचुकी-आर्य ! अनेक गजगणों के मुकुट-माणिक्य से सर्वदा जिनके पढ़तच लाल रहते हैं उन महाराज चंद्रगुप्त ने आपके चरणों में दंडवत करके निवेदन किया है कि यदि आपके किमी १४० कार्य में विघ्न न पड़े तो मैं श्रापका दर्शन किया चाहता हूँ।' _____ चाणक्य-हीनर ! क्या बृषन मुझे देखा चाहता है? क्या मैंने कौमुदीमहोत्सव का प्रतिषेध कर दिया है. यह वृषल नहीं जानता? " कंचुकी-आर्य क्यों नहीं। ' चाणक्य-क्रोध से ) हैं ! किसने कहा बोल तो। कंचुकी-भय मे) महारान प्रसन्न हो ? जब मगांगप्रामादा की अटारी पर गए तब देख कर मगराज ने आप ही जान लिया कि कौमुदीमहोत्सव अब की नहीं हुआ। ____चाणक्य -अरे ठहर, मैंने जाना, यह तुम्हीं लोगों ने वृषल १५० का जी मेरी ओर से फेर कर रमे चिढ़ा दिया। और क्या ? . कंचुकी-( भय से न चा मुह करके चुप रह जाता है।) चाणक्य-अरे ! राजा के कारबारियों का चाणक्य के ऊपर बड़ा ही विद्वेष पक्षपात है । अच्छा वृषत कहाँ है. बता। ___ कंचुकी-(डग्ता हुआ) मार्य, सुगांगप्रासाद की अटारी पर से महाराज ने मुझे आपके चरणों में भेजा है। चाणक्य( उठकर ) कंचुको ! सुगांगप्रामाद का मार्ग बता। कंचुकी-इधर महाराज । ( दोनों घूमते हैं) कंचुकी-महाराज । यह सुगांगप्रासाद की सीढ़ियाँ हैं। धोरे धीरे चढ़े। .. १६० [दोनों सुगांगप्रासाद पर चढ़ते हैं और चाणक्य के घर का परदा गिर कर छिप जाता है।। चाणक्य-(चढ़कर और चंद्रगुप्त को देख कर प्रसन्नता से) अहा ! वृषल सिंहासन पर बैठा है- हीन नंद सों रहित नृप चंद्र करत जेहि भोग । परम होत संतोष लखि श्रासन राजा जोग ।