पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/८१

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सती - 1 थी। रत्नसिंह उन्मत्त की भांति चिता में घुस गया, और चिन्ता को हाथ-पकड़कर उठाने लगा। लोगों ने चारों ओर से लपक लपककर चिता की लकड़ियां हटानी शुरू की , पर चिन्ता ने पति की ओर आँख उठाकर भी न देखा, केवल हाथों से उसे हट जाने का सकेत किया । रत्नसिंह सिर पीटकर बोला-हाय प्रिये, तुम्हें क्या हो गया है, मेरी ओर देखती क्यों नहीं, मैं तो जीवित हूँ। चिता से आवाज़ आई-तुम्हारा नाम रत्नसिंह है ; पर तुम मेरे रत्नसिंह नहीं हो। 'तुम मेरी तरफ देखों तो, मैं ही तुम्हारा दास, तुम्हारा उपासक, तुम्हारा पति हूँ।' 'मेरे पति ने वीर गति पाई।' 'हाय ! कैसे समझाऊँ ! अरे लोगो, किसी भाँति अग्नि को शात करो। मैं रत्न- सिंह ही हूँ, प्रिये ! क्या तुम मुझे पहचानती नहीं हो ?' अग्नि-शिखा चिन्ता के मुख तक पहुंच गई। अग्नि में कमल खिल गया । चिन्ता स्पष्ट स्वर में बोली-खूब पहचानती हूँ। तुम मेरे रत्नसिह नहीं । मेरा रत्नसिंह सच्चा शूर था। वह आत्मरक्षा के लिए, इस तुच्छ देह को बचाने के लिए, अपने क्षत्रिय- धर्म का परित्याग न कर सकता था। मैं जिस पुरुष के चरणों की दासो वनी थी, वह देवलोक में विराजमान है। रत्नसिंह को बदनाम मत करो। वह वीर राजपूत था, रणक्षेत्र से भागनेवाला कायर नहीं। अन्तिम शब्द निकले ही थे कि अग्नि की ज्वाला चिन्ता के सिर के ऊपर जा पहुंची। फिर एक क्षण में वह अनुपम रूप-राशि, वह आदर्श वीरता की उपासिका, वह सच्ची सती अग्नि-राशि में विलीन हो गई। रत्नसिंह चुपचाप, हतबुद्धि-सा खड़ा यह शोकमय दृश्य देखता रहा। फिर अचा- नक एक ठण्ढी साँस खींचकर उसी चिता में कूद पड़ा ।