पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/३१५

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

इस्तीफा ३११ साहव -ओ तुम बहुत सुस्त हो गया है। हम तुमको दौड़ना सिखायेगा। दौड़ो ( पीछे से धक्का देकर ) तुम अव भी नहीं दौड़ेगा ? यह कहकर साहब हटर लेने चले। फतहचद दफ्तर के वाबू होने पर भी मनुष्य ही थे। यदि वह वलवान होते, तो उस बदमाश का खून पी जाते। अगर उनके पास कोई हथियार होता, तो उस पर जरूर चला देते , लेकिन उस हालत में तो मार खाना ही उनकी तकदीर में लिखा था। वे बेतहाशा भागे और फाटक से बाहर निकलकर सड़क पर आ गये। फतहचद दफ्तर न गये। जाकर करते ही क्या ! साहब ने फाइल का नाम तक न बताया। शायद नशा में भूल गया। धीरे-धीरे घर की ओर चले, मगर इस बेइज्जती ने पैरों में बेड़िया-सी डाल दी थीं। माना कि वह शारीरिक बल में साहब से कम थे, उनके हाथ में कोई चीज़ भी न थी , लेकिन क्या वह उसकी वातों का जवाब न दे सकते थे ? उनके पैरों में जूते तो थे । क्या वह जूते से काम न ले सकते थे ? फिर क्यों उन्होंने इतनी ज़िल्लत बरटाश्त की ? मगर इलाज ही क्या था । यदि वह क्रोध मे उन्हें गोली मार देता, तो उनका क्या बिगड़ता । शायद एक-दो महीने की सादी कैद हो जाती । सम्भव है, दो-चार सौ रुपये जुर्माना हो जाता मगर इनका परिवार तो मिट्टी में मिल जाता। ससार में कौन था जो इनके स्त्री-बच्चों की खबर लेता । वह किसके दरवाजे हाथ फैलाते । यदि उनके पास इतने रुपये होते, जिनसे उनके कुटुम्ब का पालन हो जाता, तो वह आज इतनी ज़िल्लत न सहते। या तो मर ही जाते या उस शैतान को कुछ सबक ही दे देते। अपनी जान का इन्हें डर न था। जिन्दगी में ऐसा कौन सुख था, जिसके लिए वह इस तरह डरते ? खयाल था सिर्फ परिवार के वरबाट हो जाने का। आज फतहचद को अपनी शारीरिक कमजोरी पर जितना दुख हुआ, उतना कभी न हुआ था। अगर उन्होंने शुरू ही से तन्दुरुस्ती का ख्याल रखा होता, कुछ कसरत करते रहते, लकड़ी चलाना जानते होते, तो क्या इस शैतान की इतनी हिम्मत होती कि वह उनका कान पकड़ता ! उसकी आँखें निकाल लेते। कम-से-कम इन्हें घर से एक छुरी लेकर चलना था । और न होता, दो-चार हाथ जमाते हो-पोछे देखा जाता, जेलखाना ही तो होता या और कुछ !