पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१६०

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१५६ मानसरोवर बेचारे सिलविल ने मन में इन दोनों शैतानों को खूब कोसा और विष की भांति खिचड़ो कण्ठ के नीचे उतारी। आज होली के दिन खिचड़ी ही भाग्य में लिखी थी। जव तक सारी खिचड़ी समाप्त न हो गई, दोनों वहाँ डटे रहे, मानो जेल के अधिकारी किसी अनशन व्रतधारी कैदी को भोजन करा रहे हो। बेचारे को ढूंस-हॅस खिचड़ी खानी पड़ी । पकवानो के लिए गुजायश ही न रही । ( ३ ) दस बजे रात को चम्पा उत्तम पदार्थों का थाल लिये पतिदेव के पास पहुंची। महाशय मन-ही-मन झुंझला रहे थे । भाइयों के सामने मेरी परवाह कौन करता है। न-जाने कहां से दोनों शैतान फट पड़े । दिन-भर उपवास कराया और अभी तक भोजन का कहीं पता नहीं । वारे चम्पा को थाल लाते देखकर कुछ अग्नि शान्ति हुई । बोले- अभी तो वहुत सबेरा है, एक-दो घण्टे वाद क्यों न आई? चम्पा ने सामने थाली रखकर कहा-तुम तो न हारो मानते हो न जीती। अब आखिर ये दो मेहमान आये हुए हैं, इनका सेवा-सत्कार न करूं, तो भी तो काम नहीं चलता । तुम्हीं को बुरा लगेगा । कौन रोज आयेंगे। 'ईश्वर न करे कि रोज आयें, यहाँ तो एक ही दिन में वधिया वैठ गई।' थाल की सुगन्धमय, तरवतर चीज़ देखकर सहसा पण्डितजी के मुखारबिन्द पर मुस्कान की लाली दौड़ गई । एक-एक चीज़ खाते थे और चम्पा को सराहते थे-~-सव कहता हूँ चम्पा, मैंने ऐसी चीजों कभी नहीं खाई थीं । हलवाई साला क्या बनायेगा। जी चाहता है, कुछ इनाम दूं। 'तुम मुझे बना रहे हो । क्या करूँ, जैसा बनाने आता है, वना लाई ।' 'नहीं जी, सच कह रहा हूँ। मेरी तो आत्मा तक तृप्त हो गई । आज मुझे ज्ञात हुआ कि भोजन का सम्बन्ध उदर से इतना नहीं, जितना आत्मा से है । बतलाओ, क्या इनाम दूँ? 'जो माँगू, वह दोगे ?' 'दूंगा। जनेऊ की कसम खाकर कहता हूँ।' 'न दो तो मेरी बात जाय ।' 'कहता हूँ भाई, अब कैसे कहूँ। क्या लिखा-पढ़ी कर दूँ ?' 'अच्छा तो माँगती हूँ। मुझे अपने साथ होली खेलने दो।'