पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१९७

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मानसरावर निष्ट आ जाते थे कि मालूम होता था, अव संग्राम का अंत हुआ, वह तलवार पड़ी ; पर पैरों को एक ही गति, एक कावा, एक कन्नी उसे खून की प्यासी तलवारों से बाल-बाल बचा लेती थी। दाऊद को अब इस संग्राम में खिलाड़ियों का-सा आनंद आने लगा । यह निश्चय था कि उसके प्राण नहीं बच सकते, मुसलमान क्या करना नहीं जानते, इसलिए उसे अपने दाव-पेंच में मजा आ रहा था। किसी वार से बचकर उसे अब इसकी खुशो न होती थी कि उसके प्राण बच गये, बल्कि इसका आनंद होता था कि उसने कातिल को कैसा विच किया। सहसा उसे अपनी दाहिनी और बाय की दीवार कुछ नीचो नभर आई । आह ! यह देखते ही उसके पैरों में एक नई शक्ति का सचार हो गया, धमनियों में नया रक्त दौड़ने लगा। वह हिरन की तरह उस तरफ दौड़ा, और एक छलाँग में बान ने उस पार पहुँच गया । जिन्दगी और मौत में सिर्फ एक कदम का फ्रासका था। पीछे मृत्यु थी, और भागे जीवन का विस्तृत क्षेत्र । जहाँ तक दृष्टि जाती थी, म्हालियाँ ही नजर आती थी। जमीन पथरीली थी, यही ऊँची, कहाँ नौची। जगह-जगह पत्थर की शिलाएँ पड़ी हुई थीं। दाउद एक शिला के नीचे छिपकर बैठ गया। दम-भर में पीछा करने वाले भी वहां आ पहुँचे, और इधर-उधर झाड़ियों में, वृक्षों पर, गढी में, शिलाभों के नीचे तलामा करने लगे। एक गरम उस चट्टान पर आकर खड़ा हो गया, जिसके नीचे दाऊद छिपा हुआ था। शाऊद का कलेजा धकधक कर रहा था। अब जान गई । अरब ने जरा नीचे को झांका, और प्राणों का अन्त हुमा ? संयोग- केवल संयोग पर अब उसका जीवन निर्भर था। दाऊद ने साँस रोक लो, सन्नाटा खींच लिया। एक निगाह पर उसकी जिन्दगी का फैसला था। जिन्दगी और मौत में कितना सामीप्य है। मगर भरयों को इतना अवकाश कहाँ था कि वे सावधान होकर शिला के नीचे देखते । वहाँ तो हत्यारे को पकड़ने की जल्दी थी । दाऊद के सिर से बना टल गई। वे इधर-उधर ताक-झांककर आगे बढ़ गये। () अँधेरा हो गया। आकाश में तारागण निकल आये, और तारों के साथ दाऊद भी- शिक्षा के नीचे से निकला । लेकिन देखा, तो. उस समय भी चारों तरफ हलवत ।