पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/५७

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कीजिए। मुझे आशा है कि मेरे पिता को अवश्य जय प्राप्त होगी, और जब वह युद्ध में जीत जायेगा तो आपसे बदला लिए बिना कभी न रहेगा। इसलिए आप ऐसा कोई काम न करें कि जिससे आपको उसके भीषण क्रोधाग्नि में गिरना पड़े।" यह बात सुनते ही वजीर और बादशाह दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस लड़के का धैर्य-बल देखकर उसको मारने का निश्चय रहित कर दिया और उसको किसी एक टापू में कैदी बनाकर प्रतिबन्ध में रखा दिया।

इधर अल्लीपाशा ने सुलह करने के इरादे से २४ सुलियट लोगों को अपने पास बुलवाया और जब वे उसके पास आए तो वह कहने लगा कि "जब तक तुम्हारा प्रान्त हमारे आधीन न होगा, तब तक तुम यहाँ से जाने न पाओगे। यदि दो-चार दिन में यह काम न हुआ तो तुम जीते जी वापस जाओगे, ऐसी आशा न करो।" यह सुनते ही उन लोगों ने कहा कि––"अरे अल्ली, देख, तू कैसा नीच है। संधि करने के बहाने से हमें यहाँ लाकर तू इस तरह का दुष्ट काम करने को तैयार हुआ है! ऐसे आचरण से तेरी कीर्ति दूषित हो जायगी। तेरा कपट देखकर हमारा निश्चय तो अधिकाधिक दृढ़ होता जाता है कि तेरा अधिकार कदापि स्वीकार न करेंगे। स्वातंत्र्य-प्राप्ति के निमित्त हम अपना जीव भी देने को तैयार हैं। पर याद रख कि तेरे अधम कृत्य का स्मरण हमारे देश-बंधुओं के हृदय में चिरकाल जागृत रहेगा, और फिर तू हमारा प्रजासत्तात्मक राज्य कदापि पदाक्रान्त नहीं कर सकेगा। बस, तू अब संधि की बातचीत करने योग्य नहीं है। तेरे बोलने में कुछ ठिकाना नहीं।"

जब इस उपाय से भी वे लोग हस्तगत न हुए, तब पाशा ने कुछ द्रव्य देकर वह प्रान्त लेने का विचार किया। सुलियट लोगों में जो मुखिया थे, उनको द्रव्य का लोभ दिखलाकर अपने वश कर लेने के हेतु से डीमोज्वी नाम के एक श्रीमान गृहस्थ को उसने कहला भेजा