पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/२२

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चलती रही और उस समय उसके पक्ष में सबसे सटीक तर्क डॉ॰ धनंजय, इलाहाबाद ने रखा था जिसका सारांश इस प्रकार है––

"यह तय है कि सप्रेजी की 'एक टोकरी भर मिट्टी' को ही हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी होने का प्रथम गौरव दिया जा सकता है!"

यों कथात्मक तत्त्व तो इंशा अल्ला खाँ की 'रानी केतकी की कहानी' और राजा शिवप्रसाद सितारे-हिन्द के 'राजा भोज का सपना' में ही किसी-न-किसी रूप में मिलने लगे थे, फिर भी यह कथा के प्रारम्भिक विकासमान रूप ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक कई मौलिक और अनूदित कहानियाँ लिखी जा चुकी थीं। अनूदित कहानियों में देशी और विदेशी, दोनों ही प्रकार की थीं और जो मौलिक कहानियाँ थीं, वे भी इन अनुवादों से काफ़ी प्रभावित थीं। २०वीं शताब्दी के प्रथम दशक में किशोरीलाल गोस्वामी की 'इंदुमती', 'गुलबहार'; रामचन्द्र शुक्ल की 'ग्यारह वर्ष का समय'; मास्टर भगवानदास की 'प्लेग की चुडैल' आदि कहानियाँ, जिनमें से 'इंदुमती' (१९००) को प्रथम मौलिक कहानी माना गया, मुझे दो आपत्तियाँ हैं। एक तो यह कि ऊपर गिनाई गई कहानियाँ एक जगह से और हिन्दी-भाषी लेखकों द्वारा लिखी जाकर एक ही जगह प्रकाशित हुईं, इसलिए इनमें वैविध्य हो नहीं सकता; कहानी के प्रति एक लेखक का जो दृष्टिकोण रहा होगा, वही दूसरों का भी रहा होगा। उस समय तक वैसे भी साहित्य में समूह ही सब कुछ था। दूसरे, जैसा कि संकेत किया जा चुका है, मौलिक कहानियों पर अनुवादों का प्रभाव बेहद था। 'इंदुमती' उस समय लिखी जाने वाली कहानियों से थोड़ी अलग ज़रूर थी, लेकिन इस पर परदेशी-विदेशी, दोनों तरह के प्रभाव हैं। एक ओर शेक्सपीयर के 'टेंपेस्ट' की छाप है इस पर, तो दूसरी ओर एक राजपूत कहानी का प्रभाव है (हिन्दी साहित्य कोश : भाग १, पृ॰ २३७)। कहानीपन, जो सबसे स्थूल और प्रारंभिक चीज़ है, का 'इंदुमती' में सर्वथा अभाव है। रही वातावरण की बात, तो उसे