पृष्ठ:महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली खंड 4.djvu/४०७

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लंबे होंठ वाले जगली आदमी /403 - अँधेरी रात में, जहाज़ को पेड़ों की हरी-हरी डालों से तोप-तापकर, हम लोग किले वालों की नजर छिपा निकल गए। कोई डेढ़ महीने बाद हमारा जहाज़ पेरू-देश की सीमा पर पहुंचा। वहाँ से कुछ दूर आगे, गोयाज नाम के गाँव के पास, हम लोग ठहरे। अंटोनिओ और रोबेरिओ यहाँ तक पहले एक दफ़े आ चुके थे । उसके आगे वे न गए थे गोयाज़ गाँव में एक यांगसिल नामक एक जगली रहता था। वह उस गाँव का सरदार था। मभ्य आदमियों से कई दफ़े वह मिल चुका था। हम लोग उसके पास गए और बहुत कुछ इनाम देने का लालच देकर उसे अपने माथ लिया। उसने अपने बहुत से साथियो को भी जहाज पर लिया । विना इन लोगों की मदद के लंबे होंठ वालों के देश तक पहुँचना असंभव था । ये लोग उन जंगलियो से वाकिफ थे और उनकी बोली भी समझ मकने थे। गोयाज में मालूम हुआ कि जहाँ हम लोग जा रहे है, वहाँ वाले बड़े ही भयकर जीव है । उनके होंठ इतने लबे है कि उन्हें उलटकर वे अपना सारा चेहरा ढक मकते है। वे बड़े ही लडाकू और विश्वासघाती हैं । वे बहुधा पेड़ों ही पर रहते है और कोई जानवर गोमा नहीं, जिसका मास न खाते हो। लुटेरे भी वे बहुत बढ़े-चढ़े हैं। जहाज के माथ हमने गोयाज़ से 6 नावें ली। एक-एक नाव पर छ:-छ: आदमी सवार हुए। जहाज पर यांगमिल और उसके आदमी चढ़े। आखिरकार हम लोग वहां से रवाना हुए और तीन दिन बाद लंबे होंठों वालो की बस्ती के पास पहुंचे। वहाँ से उन लोगो का गाँव कुछ ही घंटो का रास्ता था। यहीं हम लोगों ने जहाज का लंगर डाला। दूसरे दिन वहाँ से हम लोग तीन नावो पर आगे बढ़े। सब मिलाकर हम 32 आदमी थे। कुछ आदमी जहाज पर रह गए । कप्तान अंटोनिओ और हमने अपनी-अपनी बंदूकें और कारतूस माथ लिए। हम लोगो ने सोचा कि कही जंगली आदमी हम पर हमला न करें। इमलिये हम पहले ही से तैयार होकर चले । कपड़े भी हमने खूब चमकते-दमकते पहने । हमें चले अभी दो ही घटे हुए थे कि हमने 6 लड़ाकू नावं अपनी तरफ आने देखा । प्रत्येक नाव पर दस-दम जंगली आदमी सवार थे। उन्हें देखते ही हमने अपनी नावे रोक दो । यागसिल खड़ा हो गया । उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर लंबे होठ वालो की भाषा में चिल्लाकर कुछ कहना शुरू किया। इस पर उन लोगो ने भी अपनी नावें रोक दी। कुछ देर में हम लोग एक-दूसरे के पास आ गए। मैंने पहले पहल लबे होंठ वालो को अच्छी तरह देखा। मुझे बे-तरह घृणा हुई। ऐसी बीभत्स रूप मैने कभी नही देखा था। ऐसे घृणोत्पादक, ऐसे मैले, ऐसे मरकटाकार आदमी पृथ्वी की पीठ पर शायद ही और कही हो। आदमी नही, आदमी की शकल के वे पूरे जानवर थे । आदमी भी इतने मकरूह हो सकते है, इसका मुझे विश्वास ही न था। इन जंगली लोगो का सरदार एक नाव पर खड़ा था । ऊँचाई में वह 6 फुट होगा। सिर खुला था। उस पर लंबे-लबे बाल थे। बालो की जटाएँ नीचे पीठ पर लटक रही थी। और होठ ! कुछ न पूछिए । कोई हाथ-भर नीचे लटक रहा था। उसने उसके चेहरे को बड़ा ही भयंकर बना दिया था। वह चिल्ला रहा था और अपनी काली-काली भुजाएँ पागल की तरह इधर- उधर फेंक रहा था । मालूम होता था कि उस पर कोई भूत सवार है। बाक़ी के असभ्य