पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/९७

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  • महाभारत प्रन्थका काल

- इस प्रथम अन्तःप्रमाणके आधार पर, वक्तत्वपूर्ण है और एक हीसे प्रयोग तथा निश्चयात्मक रीतिसे सिर्फ इतना ही वाक्योंकी पुनरावृत्ति इसके पोषणके लिये कहा जा सकता है कि आश्वलायनके की हुई देख पड़ती है । परन्तु महाभारत- गृह्यसूत्र, बादरायणके वेदान्त-सूत्र और का गद्य ऐसा नहीं है। इसमें प्राचीन पतञ्जलिके योग-सूत्रके पहले महाभारत शब्द अथवा प्राचीन प्रयोग नहीं हैं: हुआ है। इन सूत्रोका काल, विशेषतः और वक्तत्व-शक्ति भी वैसी नहीं है। पतञ्जलिका काल, ईसवी सन्के पहले स्पष्ट देख पड़ता है कि जिस समय १५०-१०० है, अर्थात् महाभारत इस संस्कृत भाषाका उपयोग साधारण समयके पहलेका निश्चित होता है। लोगोंकी बातचीतमें नहीं किया जाता था, दूसरा अन्तःप्रमाण महाभारतमें पाये उस समय महाभारतके गद्य-भागको जानेवाले गद्य और छन्दोंका है: इस- रचना की गई थी । इस गद्य-भागसे इतना लिये अब सोचना चाहिये कि महाभारत- ही अनुमान किया जा सकता है कि छन्द किस समयके हैं और जानना चाहिये ब्राह्मण और उपनिपद्-कालके अनन्तर कि उनसे महाभारतके कालका कुछ बहुत वर्षोंके बाद, जब संस्कृत भाषाका निर्णय हो सकता है या नहीं। इस दृष्टिम उपयोग बोलचाल में नहीं किया जाता था, पाश्चात्य ग्रन्थकारोंने बहुत विस्तारपूर्वक तब महाभारतको रचना हुई होगी । 'विचार किया है। यद्यपि यह विचार अर्थात् , ईसवी सनके पहले २०० के लग- निर्णयात्मक सिद्धान्तके लिये विशेष उप- भगका जो समय हमने निश्चित किया है, योगी नहीं है, तथापि पाठकोंका इसकी उसका स्थिर करनके लिये इस गद्य-भागके कुछ जानकारी अवश्य होनी चाहिये । विचारसे सहायता ही मिलती है। इसका विवेचन करनेके पहले हम यहाँ . अब हम पद्यके विषयमें विचार गद्यके विषयमें कुछ विचार करेंगे । महा- करेंगे। हाप्किन्सने अपने ग्रन्थमें इस भारतमें अनेक स्थानों में गद्य पाया जाता विषयका इतना अधिक और विस्तार- है। विशेषतः श्रादि पर्व, वन पर्व और पूर्वक विचार किया है कि उसके १७५ शान्ति पवमे यह अधिक है। इन गद्य- पृष्ठ इसी विषयसे भरे है। उसका पूरा भागोंकी रचना सौतिने स्वयं की होगी। परा उल्लेख यहाँ नहीं किया जा सकता: यह भी सम्भव है कि कहीं कहीं पहले और उससे स्थूल अनुमानके सिवा कुछ जमानेके किसी इतिहास आदिके ग्रन्थमें- अधिक मालुम भी नहीं हो सकता। इस- से कोई भाग ले लिया गया हो । पहले लिये उसकी कुछ विशेष और प्रधान बातें पर्वमें जनमेजय और देवशुनीकी कथाका यहाँ बतला देना काफ़ी होगा । महाभारत- भाग प्राचीन जान पड़ता है। परन्तु वन में मुख्यतः अनुष्टुम् श्लोक हैं और इनसे पर्व और शान्ति पर्वका गद्य-भाग नया कुछ कम उपजाति-वृत्तके अर्थात् त्रिष्टुभ्- एवं सौति-कृत देव पड़ता है। महाभारत- वृत्तकं श्लोक है । सौमें १५ अनुष्टुभ् , से का गद्य-भाग वेदकं ब्राह्मरण-भाग और कुछ कम त्रिष्टुभ् और : अन्य वृत्तोंके उपनिषद्-भागमें पाये जानेवाले गद्यसे शेष सब श्लोक हैं । इस में सब प्रकारके बिलकुल भिन्न है। ब्राह्मण-भागके गद्यमें वृत्त शामिल हैं। अक्षर-वृत्तोमें रथोद्धतासे प्रायोन वैदिक-कालीन शब्द और प्राचीन शार्दूलविक्रीड़िततक ११ वृत्तोंके नमूने प्रयोग बहुत हैं। उसकी भाषा अत्यन्त हैं । मात्रा-वृत्तोंमें पुष्पिताग्रा, अपरबत्रा,