पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/८५

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  • महाभारत अन्यका काल है

१६ - मिलती। तो भी जॉनने योग्य सब बातोंको में दिया गया है । हम पहले कह पाये है एकत्र कर देना आवश्यक है । यदि भवि- कि वर्तमान मनुस्मृति महाभारतके अन- प्यमें, समयका निर्णय करनेके लिये, कुछ न्तरकी है। नई बाते मालूम हो जायें, तो इस विषय ___ अब पुराणोंके सम्बन्धमे विचार किया का उपयोग किया जा सकेगा। महा जायगा। महाभारतमें पुराणोंका उल्लेख भारतमें अनेक सूत्रोंका निर्देश है। सभा बहुत है । इस विषयमें किसीको कुछ भी पर्वके कश्चित्' अध्यायमें युधिष्ठिरसे प्रश्न सन्देह नहीं कि वर्तमान पुराण-ग्रन्थ किया गया है कि-"गजसत्र. अश्वसत्र.. महाभारतके समयके इस पारके हैं, रथसूत्र और शतनीसूत्रका अभ्यास तम परन्तु महाभारतमें पुराणका उल्लेख है।.. करते हो न?" ये सूत्र कौन से हैं और यह एक महत्त्वका प्रश्न है कि भारतके किसके रचे हैं, इन बातोका निर्देश नहीं पहले पुराणोंकी संख्या एक थी या अठा. है; परन्तु यह देख पड़ता है कि उस रह । स्वर्गारोहण पर्वमें यह उल्लेख पाया समय अनेक विषयों पर शास्त्र-स्वरूपके आता है कि-"इस भारतमें अष्टादश सूत्र थे और उनका अभ्यास किया जाता पुगण, सब धर्मशास्त्र और अङ्गो सहित था। ये सूत्र केवल रटनेके लिये उपयोगी चार्गे वेद एकत्र हुए हैं । जो महात्मा छोटे छोटे वाक्योंके समान न होकर व्यास ऋषि अष्टादश पुराणोंके कर्ता हैं विस्तृत स्वरूपके होंगे। सूत्रकर्ता और सूत्र और वेदोंके केवल महासागर हैं, उन्हींकी कार जैसे भिन्न भिन्न नाम भी अनुशासन यह जीती जागती वाणी है। सब लोग पर्वमें पाये जाते हैं। एक स्थानमें सूत्रकार इसका श्रवण अवश्य करें ।" वर्तमान और ग्रन्थकर्ताका भी निर्देश है । इमसे समयके लोगोंकी यह समझ है कि पुराण ' मालूम होता है कि सूत्र शब्दसे सर्वमान्य अठारह हैं और उन सबके कर्ता अकेले • ग्रन्थका विशिष्ट बोध होता होगा। व्यास ऋषि हैं। यही समझ उक्त अव. धर्मसूत्रोंके सम्बन्धमें अथवा धर्म- तरणमें ग्रथित है। सम्भव है कि ये श्लोक शास्त्रों के सम्बन्धमें बहुत सा उल्लेख पाया | महाभारतके भी अनन्तरके हों; क्योंकि जाता है। क्योंकि महाभारतको धर्मग्रन्थ- इतने बड़े और अनेक ग्रन्थोकी रचना एक का स्वरूप प्राप्त करा देनेके काममें उनका ही व्यक्तिसे नहीं हो सकती । परन्तु यदि बहुत कुछ उपयोग हुआ होगा । नीति- यह श्लोक असत्य न मानकर यह माना जाय शास्त्रका नाम अनेक बार आया है । उसके कि महाभारतके पहले ये अठारह पुराण कर्ता भी अनेक देख पड़ते हैं; जैसे शुक्र, किसी छोटे स्वरूपमें होंगे, तो आश्चर्य नहीं। बृहस्पति आदि । धर्मशास्त्रोका भी उल्लेख और यह भी सम्भव है कि वेदोंकी बार बार किया गया है । एक स्थानमें व्यवस्थाके समान द्वैपायन-व्यासने इन मनुके धर्मशास्त्रका उल्लेख पाया जाता है। पुराणोंकी भी व्यवस्था कर दी हो । वायु- राजधर्म आदि सब विषयोंमें मनुके वच- पुराणका उल्लेख धन पर्वके १९१वें अध्याय- नोका उपयोग किया गया है । परन्तु यह के १६वें श्लोकमें पाया जाता है। ऐसी नहीं कहा जा सकता कि वे वचन वर्त- दशामें, यदि वायुपुराणको स्वतन्त्र और मान समयमें उपलब्ध मनुस्मृतिके हैं। पहलेका मानें, तो यह भी मानना पड़ेगा इस सम्बन्धमें किसी विस्तृत अवतरणकी कि अठारह भिन्न भिन्न पुराण पहलेसे थे। मावश्यकता नहीं । वह हाप्किन्सके प्रन्थ- : मार्कण्डेय-समस्या-पर्वमें कलियुगके वर्णन-