पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/८४

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
५८
महाभारतमीमांसा

ॐ महाभारतमीमांसा - maka भावनात्सम्भवसि हृदयादधिजायसे। उस व्यक्तिका भी समय निश्चित रूपले पामा वै पुत्रनामासि स जीव शरदःशतम् ॥ मालूम हो जाना चाहिये नहीं तो उससे यह मन्त्र कौषीतकि-ब्राह्मणमें है । कुछ भी अनुमान नहीं किया जा सकता। उसका यह भी कथन है कि उसके आगे-: इस दृष्टिसे विचार करके ऊपर जिन दो का श्लोक- सूत्रोंका उल्लेख हमने किया है उन्हींका जीवितं त्वदधीनं मे सन्तानमपि चाक्षयम्। विस्तार-सहित निर्देश करना हमारे लिये तस्मात् त्वं जीव मे पुत्र सुसुखी शरदांशतम्। आवश्यक था। इन दोनों प्रन्थोंके कर्ता यह मन्त्र कौषीतकिमें नहोकर आश्व- प्रसिद्ध हैं, इनके ग्रन्थ भी प्रसिद्ध हैं और लायनसूत्र में ही पाया जाता है। परन्तु इन ग्रन्थोंका समय भी मोटे हिसाबसे इससे यह प्रकट होता है कि वह आश्व- निश्चित सा है। आश्वलायनके गृह्यसूत्र लायनका नहीं है। इन श्लोकोंको प्रारम्भ- और बादरायणके घेदान्तसूत्रका समय में ही मन्त्र कहा गया है, जैसे "वेदेवपि ईसवी सन्के पहिले १०० वर्षके लगभग बदन्तीमं मन्त्रग्राम द्विजातयः ।" इससे है। इन दोनोंमें महाभारतका उल्लेख है। प्रकट होता है कि यह श्लोक किसी अन्य यानी आश्वलायनमें महाभारतका प्रत्यक्ष स्थानमें, वेदके किसी भागमें, है । यदि वह नाम है और वेदान्तसूत्रमें महाभारतके कौषीतकिमें नहीं पाया जाता,तो वह अन्य वचन स्मृति कहकर उद्धृत किये गये हैं। किसी शाखामें होगा जो इस समय उप- अतएव निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है लब्ध नहीं है। सारांश, यह कभी नहीं कहा कि ये दोनों ग्रन्थ महाभारतके अनमसरके जा सकता कि यह श्लोक श्राश्वलायनसे हैं। अब महाभारतमें भी इन प्रन्योंका लिया गया है। श्राश्वलायनमें तो महा-! उल्लेख देख पड़ता है: परन्तु हमने भारतका नाम-प्रमाण प्रत्यक्ष है। ऐसी । विस्तारपूर्वक विवेचन करके सिद्ध कर अवस्थामे महाभारतमें आश्वलायनके दिया है कि यह उल्लेख उन ग्रन्थोंके सम्ब- श्लोकका पाया जाना कभी सम्भव नहीं। धर्म नहीं है। यह बात भी ध्यान देने . जब किसी एक ग्रन्थमें किसी दूसरे योग्य है कि उक्त दोनों प्रन्थकर्ताओके प्रन्थका प्रमाण हो और उससे रचना- । नाम महाभारतमें बिल्कुल हैं ही नहीं । कालका निर्णय करना हो, तो दो बातोंका : (हाप्किन्सने कहा है कि अनुशासन पर्वके सुबूत अथवा दो बातोंकी जानकारी अवश्य चौथे अध्यायमें श्राश्वलायनका निर्देश है। चाहिये । पहली बात-दूसरा ग्रन्थ उसी परन्तु स्मरण रहे कि यह आश्वलायन खितिमें इस समय है या नहीं: और गोत्र-प्रवर्तक है, न कि सूत्रकार । विश्वा- दूसरी बात-उस दूसरे ग्रन्थका निश्चित मित्रके जो अनेक पुत्र हुए, उनमेसे यह समय कौन सा है। यदि उस दूसरे ग्रन्थ- एक गोत्र-प्रवर्तक पुत्र था। अर्थात्, यह का निश्चित समय मालूम न हो तो ऐसे बेद-संहिता कालका ऋषि है, न कि प्रमाणसे कुछ भी निष्पत्ति नहीं होती। सूत्रकार ।) यदि किसी एक व्यक्तिका नाम उसमें हो, अब हम उन सूत्रोंका कुछ विचार तो सिर्फ इतना ही निश्चय हो सकता है करेंगे जिनका उल्लेख सामान्य रोतिले कि उस व्यक्तिका समय पहलेका है। महाभारतमें पाया जाता है। हम ऊपर परन्तु इस बातका निश्चय नहीं हो सकता कह चुके हैं कि इससे महाभारतके समय- कि वह प्रन्थ ज्योका त्यों है । इसके सिवा ' का निर्मय करने में कुछ भी सहायता नहीं