पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/६१५

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  • भगवडीता-विचार ।*

के समाजको निवृत्तिका पाठ सिखलाने- ओर कर्मका आडम्बर तोड़ा और दूसरी का महत्वपूर्ण कार्य करना पड़ा, उसी ओर निवृत्तिका, अर्थात भ्रान्त निवृतिका प्रकार उन्हें दूसरी ओर उलटी दिशामें आडम्बर तोड़ा और सब लोगों के लिए बहती हुई निवृत्तिकी बाढ़को भी बाँधना सुगम नवीन भक्ति-मार्ग पतिपादित पडा। उस समय निवृत्तिमै कोरा आड किया । समाजकी इस परिस्थितिका म्बर कैसा दिखाई देता था तथा समस्त स्वरूप पाठकोंके ध्यानमें ठीक ठीक लानेके धार्मिक बातों में लोगोंकी कैसी कम.लिए इस सिद्धान्तका हम कुछ और समझी थी, यह बात यहाँ विस्तारपूर्वक ऐतिहासिक विवेचन करेंगे। दिखाई जाती है । श्रीकृष्णका समय वैदिक आर्यों का स्वभाव । औपनिषद-विचारोंका समय है । अतः श्रीकृष्ण द्वारा उपदेश की हुई दिव्य भग ___ ऋग्वेदकी अनेक ऋचाओंसे स्पष्ट बदीताका ठीक रहस्य समझने के लिये, दिखाई देता है कि प्राचीन भारती आर्यों- यह देखना चाहिए कि उस समय कोन- की मानसिक स्थिति उस समय कैसी थी सी धार्मिक कल्पना प्रचलित थीं । उस जब कि वे पहलेपहल हिन्दुस्थानमें आये समय मुख्यतः वेद, वेदान्त, सांख्य तथा । थे। ऋग्वेद-कालीन अायोंमें नई शक्ति योग मत प्रचलित थे; और हर एक : और नया जोश था। वे प्रसन्नमन, शूर- मत सभी बातोंको अपनी ओर खींच रहा वीर तथा संसारकी उपभोग्य वस्तुओंका था। यद्यपि इन मतोके वर्तमान सूत्र-ग्रन्थ उचित उपयोग करनेवाले थे। वे इन्द्र, अभीतक निर्माण नहीं हुए थे तथापि ये मत वरुण आदि देवताओंसे सुन्दर स्त्रियाँ, उनके मुख्य सिद्धान्तोंके साथ प्रस्थापित वीर पुत्र और ताकतवर घोड़े माँगते हए थे और वे एक दूसरेका निषेध करके थे। वे स्वयं सोमरस पीते और अपने अपनी बात सिद्ध करते थे। कुछ लोग । प्रिय देवताओंको भी सोमरस पीनेके कहते थे कि मनुष्यको चाहिए, कि वह वेद- लिए आह्वान करते थे। वे स्वयं मांस में बतलाये हुए यज्ञयागादि कर्म ही करे । खाते और यज्ञमें पशुको मारकर देवताश्री- और स्वर्ग प्राप्त करे । कुछ लोग कहते थे कि को मांस अर्पण करते थे। उनका अन्तिम कर्म बिलकुल नहीं करना चाहिए: परन्तु उद्देश स्वर्ग था । और, वह स्वर्ग भी सुख बृहदारण्यकके "पुत्रषणायाश्च वित्तषणा- एवं ऐश्वर्य भोगनेका स्थान था। सारांश, याश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षा- पहलेपहलके आर्य प्रवृत्तिके भोक्ता थे, चयं चरन्ति" इन वचनोंके अनुसार । तथापि उनमें निवृत्तिके बीजका बिलकुल संसार छोड़कर मनुष्य जङ्गलमें चला ही अभाव न था। हमें यह इसलिए आय । जब इस प्रकारका वाद पढ़े-लिखे मालूम होता है कि कई एक वैदिक लोगों में हो रहा था, तब बहुजन समाज- ऋचाओंमें उनकी निवृत्ति-प्रधान प्रार्थनाएँ को विशेषतः मिश्र समाजको तथा शूदों- हमारे सामने उपस्थित है । हिन्दुस्थानमें को किसीका आधार न रह गया। उनके भारतीय आर्योंके आने पर गंगा और लिए न तो वैदिक कर्म करना ही सम्भव सरस्वतीके बीचकी ब्रह्म-भूमिमें इसी था और न औपनिषदिक संन्यास-मार्ग निवृत्तिके बीजसे विशाल वृक्ष उत्पन्न ही खुला था। ऐसी परिस्थितिमें श्रीकृष्णने हुआ, जिसमें औपनिषदिक विचार-रूपी भगवद्गीताका दिव्य उपदेश देकर एक अत्यन्त मनोहर और रसपूर्ण फल लगे।