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महाभारतमीमांसा
  • महाभारतमीमांसा *

- तब प्रचलित भी होगी । इस कालके उसका अर्थ भी ठीक जमता है। ऐसे ही अनन्तर कल्पमें चौदह मनु और हर एक महत्वका एक और तीसरा ज्योतिर्विषयक मनुके साथ भिन्न भिन्न सप्तर्षिकी कल्पना उल्लेख भमवद्गीतामें है। वह यह है- प्रचलित हुई और यह माना गया कि "मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां आधुनिक कालतक सात मनु हुए । यह समाकरः।" यह श्लोकार्ध देखने में सिद्धान्त मनुस्मृति और पुराणोंमें स्पष्ट सरल है; पर उसमें बड़ा ऐतिहासिक रीतिसे दिखाया गया है और वहीज्योति- ज्ञान और गूढ रहस्य भरा है। प्रश्न यह षियोंने ले लिया है। महाभारतमें-यानी : है कि श्रीकृष्णने महीनोंमें मार्गशीर्षको सौतिके महाभारतमें-चौदह मनुकी और ऋतुओंमें कुसुमाकरको अग्रस्थान कल्पनाका उल्लेख स्पष्ट रोतिसे नहीं है, · क्यों दिया ? यदि यह कहा जाय कि तथापि ऐसा दिखाई देता है कि उस श्रीकृष्णको ये दोनों प्रिय थे, तो आगे समय वह प्रचलित हुई होगी । शांति बोलनेके लिए कोई गुंजाइश ही नहीं। पर्वके ३४१ वें अध्यायमें भगवद्गीताकी पर बात ऐसी न होगी । यह स्पष्ट है कि यही कल्पना पहले स्वायम्भुव मनु पर महीनोंके प्रारम्भमें मार्गशीर्ष और ऋतुमो- लगाई गई और वहाँ ऐसा वर्णन किया में वसन्तकी गणना की जाती थी, इससे गया है कि सप्तर्षि और मनुसे प्रजा उन्हें अग्रस्थान दिया गया है । इसके उत्पन्न होती है। सिवा यह भी कह सकते हैं कि यदि मरीचिरंगिराश्वात्रिःपुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। ' मार्गशीर्ष मास अच्छा मालुम हुआ था वसिष्ठश्च महात्मा वै मनुः स्वायंभुवस्तथा। तो हमन्त ऋतु मंचनी चाहिए थी, पर शेयाः प्रकृतयोऽयोतायासुलोकाः प्रतिष्टिताः ऐसा नहीं हुआ । इससे हम जो कहते हैं अष्टाभ्यः प्रकृतिभ्यश्च जातं विश्वमिदं जगत्॥ वही बात होगी । वर्तमान महीनों में इससे कदाचित् महाभारत-कालमें ' चैत महीना पहला है और ऋतुओं में ही यह मान लिया गया होगा कि हर एक बसन्त है और लोगोंकी गिनतीमें दोनों मन्वंतरमें प्रजा कैसे उत्पन्न होती है और का ऐक्य भी है । यथार्थमें बसन्त ऋतु भिन्न भिन्न महर्षि और वंश-कर्ता कैसे आजकल फागुनके भी पहले आती है। होते हैं । यहाँ यह अनुमान होता है कि ' तथापि जव चैत, बैसाखसे बसन्त ऋतुकी भगवद्गीता-काल और महाभारत-काल- गिनती शुरू हुई, तबसे दोनोंका ऐक्य में बड़ा ही अन्तर होगा, और यह भी निश्चित हुआ और वे अपने अपने वर्गमें मालूम होता है कि भगवद्गीता-काल अग्रस्थानमें हैं । यह प्रसिद्ध है कि यह वैदिक कालके निकट ही कहीं होगा । इस गणना ईसवी सन्के प्रारम्भके लगभग अनुमान परसे यद्यपि निश्चयात्मक-काल- । भारती अर्वाचीन सिद्धान्तादि ज्योतिषने का अनुमान नहीं निकलता, तथापि यह शुरू की । अब हमें यह देखना चाहिए दिखाई देता है कि वह बहुत प्राचीन कि महीनोंकी गणनामें मार्गशीर्षको और अवश्य है। प्रतीकी गणनामें बसन्तको पहले अभीतक हम यह देख चुके हैं कि मानने की बात भरतखण्डमें कबसे शुरू भगवद्गीता-कालके सम्बन्धमें 'महर्षयः . हुई, और यदि यह निश्चयपूर्वक मालूम सप्त पूर्षे चत्वारो मनवस्तथा' श्लोकार्थ हो गया तो भगवकीताका काल हम बहुत महत्वका है और उपर्युक्त कल्पनासे शीघ्र जान सकेंगे।