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महाभारतमीमांसा

५७४ ® महाभारतमीमांसा ® सावरणि तथा सावर्ण्य ऐतिहासिक है और वहाँ भिन्न भिन्न ऋषि तथा वंश- दिखाई देते हैं पर वैवखत काल्पनिक कर्त्ता दिये गये हैं, जिनके नाम बतलाने. दिखाई देता है। संवरण नामक राजाका की यहाँ आवश्यकता नहीं। यहाँ केवल उल्लेख चान्द्रवंशमें है। परन्तु यहाँ मत्स्य-पुराणमें बतलाये हुए मनुके नाम उसका उल्लेख नहीं है । यह मनु काल्प- | दिये जाते हैं । १ स्वायंभुव, २ स्वारोचिष, निक हो या न हो, परन्तु यह स्पष्ट है कि ३ औत्तमि, ४ तामस, ५ रैवत, ६ चाक्षुष, एकसे अधिक मनुकी कल्पना ऋग्वेद-७ वैवस्वत । ये अभीतक हो चुके हैं और कालीन है। ऐसी कल्पना हर एक बुद्धि- अब आगे आनेवाले मनु ये हैं:-- साव- मान् जातिमें पैदा होनी ही चाहिए। र्य, हरोच्य, १० भोत्य, ११ मेरुसावर्णि, यह कल्पना कि सृष्टिकी उत्पत्ति होने पर १२ ऋत, १३ ऋतधाम और १४ विष्व- उसका नाश होगा, जितनी स्वाभाविक सेन । अन्य पुराणों में आगामी मनुके है, उससे कहीं स्वाभाविक यह कल्पना नाम भिन्न हैं और उनमें "सावर्णि" शब्द- है कि एकसे अधिक मनु हैं; क्योकि से बने हुए जैसे “दक्षसावर्णि, रुद्रसा- सांसारिक अनुभवसे हमें मालूम है कि वर्णि" श्रादि बहतसे नाम पाये हैं। यहाँ कई वंश वृद्धि होनेके बाद मिट जाते हैं: : यह बतलाना आवश्यक है कि ऋग्वेदमें उसी प्रकार हमें देख पड़ता है कि एक जिस सावर्णि मनुका उल्लेख है वह इस ही समयमें मनुप्यकी मुख्य मुख्य जातियाँ मुचीमें बिलकुल नहीं पाया है । हाँ, यह भिन्न भिन्न रहती है। अर्थात् भिन्न स्पष्ट बतला दिया है कि सावर्य मनु भिन्न मनुकी कल्पनाका अति प्राचीन- श्रागे होगा । ऋग्वेदके उल्लेखसे यह कालीन होना असम्भव नहीं है। ज्ञात होता है कि यह मनु पीछे कभी हो __ परन्तु यह नहीं कह सकते कि ! चुका है और इसका सम्बन्ध यदुतुर्वशसे ऋग्वेद कालमें कितने मनुकी कल्पना दिखाई देता है । इस विवेचनसे यह स्पष्ट थी। यह निर्विवाद है कि महाभारतके मालूम होता है कि ऋग्वेदमें की हुई अनेक पश्चात् बनी हुई मनुस्मृतिमें चौदह मनु- मनुकी कल्पना आगे बराबर जारी रही; की कल्पना है और वही सब पुराणों परन्तु वहाँ दिये हुए उनके नाम प्रायः तथा ज्योतिषियोंने ली है। इस कल्पनाके पीछे रह गये। साथ और भी दो कल्पनाएँ की गई हैं। हमारी रायमें भगवद्गीताका 'मह- हर एक मनुके समयके सप्तर्षि भिन्न हैं र्षयः सत पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा' और हर एक मनुके दस पुत्र वंश-कर्ता श्लोक वैदिक-कालकी कल्पनासे मिलता होते हैं और वे वंश-कर्ता सप्तर्षिसे भिन्न है और वह मन्वादि ग्रन्थके चौदह मनु- होते हैं। इस प्रकार चौदह मनुके समय- की कल्पनाके पूर्वका है। ऋग्वेदमें तीन के भिन्न भिन्न सप्तर्षि ६८ होते हैं तथा मनुका उल्लेख है तथा यास्कके निरुक्तके चौदहके दस दस वंश-कर्ता मिलकर (३-१-५) 'मनुः स्वायम्भुवो ऽब्रवीत् १४० वंश-कर्ता होते हैं । इन सबके वाक्यमें चौथे मनुका नाम आया है। अलग अलग नाम पुराणोंमें दिये हैं। अर्थात् हमारी रायमें जिन स्वायम्भुव, विवस्वत् वर्तमान मनु है । वह सातवाँ सावरणि, सावर्ण्य और वैवस्वत चार है। इसके आगे और सात मनु आवेंगे। मनुका उल्लेख भगवद्गीतामें पाया है, वह इस प्रकार पुराणोंकी यह विस्तृत कल्पना वेदिक साहित्यके आधार पर ही भव-