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महाभारतमीमांसा
  • महाभारतामांसा *

हुई कुछ कथाओंकी रचना भीकी है। परन्तु कथा अत्यन्त विस्तृत है, तथापि महाकवि सब बातें झूठ हैं, क्योंकि महाभारतमें व्यासजीने उसे सङ्कलित करके दूसरी ओर कुर्योधनकी स्त्रीका नामतक नहीं है । अपना ध्यान आकर्षित होने नहीं दिया । इलियडके प्रतिनायक हेकरकी स्त्रीका | महाभारतका मुख्य विषय भारती-युद्ध है। माम एन्ड्रोमकी है। जिस समय हेक्टर | इसलिये भारती-युद्धके अतिरिक्त अन्य लडाईके लिये बाहर जाता है. उस समय बातोका वर्णन खब बढाकर नहीं किया उसका स्त्रीके साथ जो करुणायुक्त सम्भा- गया है। उदाहरणार्थ, श्रीकृष्णका चरित्र पण हुआ है, उसका वर्णन इलियडमें देखिये । श्रीकृष्णके चरित्रका जितना भाग दिया गया है। परन्तु भारतके प्रतिनायक भारती-युद्ध के साथ संलग्न है, उतना ही दुर्योधनकी पत्नीका एक भी सम्बाद महाभारतमें दिया गया है। इसमें उनके भारतकारने नहीं दिया। हम समझते हैं। बाल-चरित्रका वर्णन कहीं देख नहीं कि इसमें ग्रन्थकारको विशेष कुशलता पड़ता। रुक्मिणीके विवाहकी सुरस कथा देख पड़ती है । इसका कारण यह है कि और श्रीकृष्णके अन्य विवाह-सम्बन्धी व्यासजीने दुर्योधन-पात्र बहुत हठीला वर्णन भी इसमें नहीं हैं । उनका अप्रत्यक्ष और मानी बतलाया है। यदि दुर्योधनके उल्लेख कहीं कहीं सम्भाषणमें पाया जाता लड़ाई पर जाते समय और अपनी प्रिय- है, परन्तु पूरा पूरा वर्णन इसमें कहीं पत्नीले बिदा होते समय, उसके नेत्रों- नहीं है। सामान्य पाठकोको मालूम होता से आँसूकी एक भी बदकेटपकनेका वर्णन है कि यह इस ग्रन्थकी टिहै। परन्तु कविने किया होता, तो उससे वह मानी यह बात ऐसी नहीं है। इसमें सचमुच पात्र कलङ्कित हो जाता । सारांश, यहाँ कविको कुशलताहै। प्रधान विषयको छोड़ कविका चातुर्य ही विशेष रूपसे दृष्टि- कर किसी अन्य विषयके वर्णनमें लग गोचर होता है। परन्तु इससे यह अनुमान जाना दोष है: इसलिये व्यासजीने अपने करना उचित न होगा कि दुर्योधन बड़ा भारतमें श्रीकृष्णके चरित्रको स्थान नहीं कर या निर्दय था और अपनी स्त्रीको दिया । बाहरसे देख पड़मेवाली इस त्रुटि- प्यार नहीं करता था। जिस समय गदा- की पूर्ति सौतिने हरिवंश नामक खिलपर्व युद्ध जाँघके फट जानेसे दुर्योधन समर- जोड़कर कर दी है। इस रीतिसे पाठको- भूमिमें विह्वल हो रहा था, उस समय की जिज्ञासा भी तृप्त हो गई है। अस्तु; महाकवि व्यासजीने उसके विलापमें महाभारतका विषय अति विस्तृत और माता-पिताके स्मरणके साथ स्त्रीकी बात भी महत्त्वका है। इसमें सन्देह नहीं कि जिस पड़ी चतुराईसे शामिल कर दी है और युद्ध में १८ अक्षौहिणी अर्थात् ५२ लाख वीर उसके मुखसे कहलाया है कि- "हे लक्ष्मण-आपसमें इतनी तीव्रता और निश्चयसे लड़े मातः मेरे बिना तेरी कैसी गति होगी। थे कि,एक पक्षमें सात और दूसरे पक्ष में इस विवेचनसे पाठक समझ जायँगे कि तीन कुल मिलाकर सिर्फ दस धीर जिंदा महाभारतका विषय यद्यपि बहुत बड़ा है बचे, वह युद्ध होमरके इलिडयके युद्धसे तो भी वह और अधिक विस्तृत होने बहुत ही बड़ा था। योग्य है। पर भारती-युद्ध का महत्त्व इससे भी इस बातका एक और उदाहरण दिया और अधिक है । हिन्दुस्थानके प्रायः सब जा सकता है कि यद्यपि महाभारतकी गजा लोग इस युद्ध में शामिल थे। इतना