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महाभारतमीमांसा

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  • महाभारतमीमांसा *

- आजतक संसारमें धर्मके चार परम पाला द्वारकाधीश श्रीकृष्ण, और मग- विल्यात उपदेशक हो गये है-अर्थात् वद्गीताका दिव्य उपदेश देनेवाला श्रीकृष्ण,बुद्ध, ईसा और मुहम्मद । इन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण-ये तीनों भित्र सिन जो मत प्रतिपादित किये, उन्हें अबतक ' हैं । गोकुलके श्रीकृष्णकी जो लीलाएँ लाखों और करोडो लोग मानते हैं। इन वर्णित हैं वे ईसाकी बाललीलाके सदृश 'प्रसिद्ध धर्म-संस्थापकोंमेंसे केवल मुह- हैं, अतः इन लोगोंका कथन है कि भाभीर म्मदने ही अपने हाथसे अपना धर्मग्रन्थ जातिके गोप और गोपियोंके द्वारा यह धर्म “ अपने अनुयायियों को दिया था। यह प्रसिद्ध ईसवी सन्के बाद हिन्दुस्थानमें बाहरसे है कि शेष तीनोंके चरित्र और सम्भाषण- लाया गया था और आगे चलकर इनके को उनके प्रत्यक्ष शिष्योंने नहीं, वरन् लाये हुए कृष्णका तथा भारतमें वर्णित शिष्योंके अनुयायियोंने कई वर्षों के बाद कृष्णका एकीकरण हो गया । यह भी मत एकत्र कर उनका धर्म-ग्रन्थ तैयार किया है कि भगवद्गीतामें जिस अत्यन्त उदात्त है । बुद्धके पश्चात् सौ वर्ष के बाद बौद्ध तत्वज्ञान और नीतिके आचरणका उप- ग्रन्थ तैयार हुए; और ईसाके पश्चात् बाइ.. देश किया गया है. वह भारती-युद्धके बिलका 'नवीन करार' भी लगभग इतने श्रीकृष्णके श्राचरणमे विपरीत है। इतना ही वर्षोंके बाद तैयार हुश्रा । ऐसी दशामें ही नहीं, वरन वह उपदेश कृष्णके उस निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि अश्लील पाचरणसे भी बहुत असम्बद्ध उनमें दिये हए बद्ध या ईसाके शब्द है जो उसने गोगियों के साथ किया था। उनके ही हैं: तथापि यह मान लेनमें अतएव श्रीकृष्ण नामके तीन व्यक्ति माने कोई आपत्ति नहीं कि उनके उपदेशका जानेका जो सिद्धान्त कुछ लोगोंने किया सार यही था। इसी प्रकार जिस भग- है, उसका हम यहाँ संक्षेपमें विचार करेंगे। पद्गीताको श्रीकृष्णके उपदेशका सार। हमारी गयमें एक श्रीकृष्णके तीन समझकर व्यासने अपने ग्रन्थके मध्य श्रीकृष्ण कर देनेकी कुछ भी आवश्यकता भागमें स्थान दिया है, उसे भीव्यास-मुख- नहीं है। हम आगे विस्तारपूर्वक और से ही पूज्यत्व देनेमें कोई आपत्ति नहीं। स्वतन्त्र गतिसे दिस्वा देंगे कि गोकुलमें किंबहुना, यह भी समझ लेना कुछ युक्ति- तथा महाभारतमें श्रीकृष्णका जो चरित्र बाह्य न होगा कि इसमें दिये हुए विषय- है वह यथार्थमें अति उदात्त है और वह का प्रतिपादन श्रीकृष्णके मुखमे ही किया भगवद्गीताके दिव्य उपदेशसे किसी गया है। प्रकार विपरीत नहीं है । यहाँ सिर्फ इतना एक श्रीकृष्ण, तीन नहीं। ही कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक कुछ लोगोंने यह प्रश्न भी उपस्थित कर दृष्टिसे उक्त कल्पना असम्भव है । भगव- दिया है कि भगवद्गीतामें जिस श्रीकृष्ण- गीतामें श्रीकृष्णको भगवान् कहा है, का मत प्रतिपादित है वह श्रीकृष्ण भिन्न इसका कारण यही है कि हर एक है और भारती-युद्धमें पाण्डवोंके पक्षमें तत्वज्ञानके उपदेशकके लिए भगवान् लड़नेवाला श्रीकृष्ण भिन्न है। कुछ लोग संशाका उपयोग किया जाता है । अर्जुन- तो श्रीकृष्ण नामके तीन व्यक्ति मानते हैं: . ने जब यह कहा कि "शिष्यतेडर जैसे गोकुलमें बाललीला करनेवाला 'शाधि मां त्वां प्रपन्नम्" तब सचमुच श्रीकृष्ण, भारतीय युद्ध में शामिल होवे- श्रीकृष्णके लिए तत्वज्ञानोपदेशकके नातेसे