पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/५८७

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  • मगवद्रीता-विचार । *

५५8 अठारहका प्रकरण। बगीता ग्रन्थ सौतिका बनाया हुमा नहीं है। यहाँ यह बतानेकी आवश्यकता नहीं कि, सौतिने स्वयं अपने विस्तृत महा- भारतमें भगवद्गीताके कौनसे वचन बार भगवद्गीता-विचार। बार उद्धृत किये हैं । ये वचन पाठकों के समस्त प्राचीन संस्कृत साहित्य में जिस ध्यानमें तुरन्त ही आ जायेंगे। महाभारत प्रकार महाभारत अत्यन्त श्रेष्कारक मनमे भगवद्गीताके विषयमें जो उसी प्रकार महाभारतके सब श्राख्यानो आदर था वह उन वचनोंसे देख पड़ता और उपाख्यानोंमें भगवद्गीता श्रेष्ठ है। है। यह स्पष्ट जान पड़ता है कि महा- महाभारतमें ही जगह जगह पर भग- भारतका निर्माण करते समय सौतिके वद्गीताको प्रशंसा है। भगवद्गीता उपनिषद सामने वर्तमान समयकी सम्पूर्ण भग- तुल्य मानी जाती है और सब प्राचीन , बबीता थी। इस बातके एक या दो अन्य तथा अर्वाचीन, प्राच्य तथा पाश्चात्य तत्व- प्रमाण भी दिये जा सकते हैं। हम पहले शानी उसका आदर करते हैं। इसलिए लिख चुके है, कि सौतिने मूल भारतके महाभारतकी मीमांसामें भगवद्गीताके कई उत्तम भागोंका अनुकरण कर विस्तृत विषयमें स्वतन्त्र और विस्तृत रीतिसे महाभारत बना डाला है। भगवद्गीताका विचार किया जाना अत्यन्त आवश्यक है। ही अनुकरण कर उसने अश्वमेध-पर्वमें निस्सन्देह इस विचारके अभावमें यह एक गीताको स्थान दे दिया है और उसका प्रन्थ अधूरा रह जायगा । अतएव इस नाम भी 'अनुगीता' रखा है । अर्थात् वह प्रकरण में भिन्न भिन्न दृष्टिसे भगवद्गीता- भगवद्गीताके अनुकरण पर पीछेसे सम्बन्धी विचार करनेका हमने निश्चय बनाई गई है। सारांश, भगवद्गीता सौति- किया है। भगवद्गीताके सम्बन्धमें जो के सामने न केवल अति उत्तम नमूनेके अनेक शंकाएँ आजतक लोगोने को हैं सदृश थी, किन्तु उसने भगवनीताकी उनका भी समाधान यथा-शक्ति यहाँ स्तुतिश्रीकृष्णके मुखसे ही इस अनुगीताके किया जायगा। प्रसङ्गमें कराई है। जब युद्ध के बाद अर्जुनने भगवद्गीता सौति-कृत नहीं है। श्रीकृष्णसे यह कहा कि- "युद्धके आर- रम्भमें जो दिव्य-ज्ञान मुझे आपने बत- भगवद्गीताके सम्बन्धमें पहला प्रश्न लाया था सो फिर बताइये, क्योंकि वह यह है, कि क्या यह प्रन्थ एक हो कर्ता- (मेरा शान) नष्ट हो गया है," तब श्रीकृष्ण- का या महाभारतके समान इसमें भी दो ने यह उत्तर दिया किः- तीन कर्ताओंकी रचना देख पड़ती है ? हमारे मतसे भगवद्गीता ग्रन्थ प्रारम्भसे परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन चेतसा। अन्ततक, एक ही दिव्य-कल्पना-शक्तिसे न शक्य तन्मया भूपस्तथा वक्तुमशषतः ॥ निर्मित किया गया है और वह सब स स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः परिवेदने । प्रकारसे सर्वांग सुन्दर तथा सुषद्ध है। ने न च साद्य पुनर्भूयः स्मृतिर्मे संभविष्यति ॥ हमने महाभारतके तीन कर्ता निश्चित (अश्व० अ० १६) किये हैं:-व्यास, वैशम्पायन और सौति। "मैं उस भगवीताको फिरसे न कह हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि भग- सकूँगा।" श्रीकृष्णके इस वाक्यमें न आने