पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/५२५

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  • तत्वज्ञान | ॐ

४६७ पर फिर भासमान होने लगता है। भारतो प्रायोंके सूक्ष्म निरीक्षणका बहुत चन्द्रमाके जन्म, वृद्धि और क्षयके धर्म : अच्छा प्रमाण है । इस दृष्टान्तसे हमें यह देख पड़नेवाले चन्द्रबिम्बमे सम्बन्ध : अच्छी तरह मालुम हो जाता है, कि अमूर्त रखते हैं। परन्तु प्रत्यक्ष चन्द्र इनसे अलग अात्मा देहसे अलग क्यों दिखाई नहीं देता: है-उससे इन धर्मोंका कोई सम्बन्ध और देहका सम्बन्ध होने पर कैसे दिखाई नहीं । बस, इसीप्रकार जन्म, मृत्यु, वृद्धि, देने लगता है। इसी भाँति, जैसे पृथ्वी- जरा इत्यादि देहके धर्म हैं, प्रान्माके नहीं। की छाया चूँकि हमको दिखाई नहीं देती जिस प्रकार ग्रहणके समय चन्द्रमा पर इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि वह पड़नेवाली छाया और अँधेरा चन्द्रमाके है ही नहीं, वैसेही श्रात्मा भी चूँकि देहसे पास पाता हुआ दिखाई नहीं पड़ता, अलग दिखाई नहीं देता, इससे यह नहीं अथवा चन्द्रमासे छूटा हुआ भी दिखाई कह सकते कि आत्मा नहीं है। तीसरे, नहीं पड़ता, उसी प्रकार जड़ शरीरमे पाते इस दृष्टान्तका सबसे बड़ा गुण यह है कि हुए अथवा इससे जाते हुए आत्मा भी इससे आत्माका स्वरूप पूर्णतया हमारी हमको दिखाई नहीं देता। अर्थात् राहु समझमें आ जाता है। प्रात्मा मृर्त पदार्थ अथवा छायाका ज्ञान स्वतन्त्र नहीं हो नहीं है: किन्तु वह छायाके समान अमृत सकता। वह जब चन्द्र अथवा सूर्यके है: और पृथ्वीकी छाया जैसे सूर्य से पड़ती मण्डलसे सम्बन्ध पाता है, तभी उसका है, वैसे ही श्रान्मा परमात्माको छाया है. शान होता है। इसी प्रकार शरीरान्तर्गत . किंबहुना वह परमात्माका प्रतिबिम्ब है। आत्माकी उपलब्धि हमें होती है, शरीरसे और इसलिए आत्मामें परमात्माका चित. वियुक्त श्रात्माकी उपलब्धि नहीं होती।" स्वरूप और अानन्द-स्वरूप भी भरा हमा शान्तिपर्व अध्याय २०३में दिया हुआ है। तात्पर्य यह है कि, तत्ववेत्ताओंका उपर्युक्त वर्णन आत्माका अस्तित्व बहुत ही यह सिद्धान्त हमारे अनुभवमें आता है सुन्दर रीतिसे पाठकोंके मन पर जमा कि आत्मा है। यही नहीं, बल्कि वह देता है। उसमें दिये हुए दृष्टान्त बहुत ही ईश्वरका अंश है। मार्मिक और कवित्वपूर्ण हैं। यह सम- . जीवका दुःखित्व। झानेके लिए कि, शरीरमें ही रहते हुए . मात्मा कैसा प्रतीत होता है और शरीरसे यहाँ यह प्रश्न उपस्थित होता है कि, अलग होने पर प्रतीत नहीं होता, जो आत्मा यदि परमेश्वरकी छाया है, और ग्रहणका दृष्टान्त दिया हुआ है, वह बहुत यदि वह चित्स्वरूप और प्रानन्दस्वरूप है ही प्रभावशाली और कवित्वपूर्ण है। पृथ्वी- तो मनुष्य अज्ञानी, दुःखी, कुमार्गगामी की छाया जो आकाशमें घूमती रहती है, क्यों होता है ? ग्रीक दार्शनिकोंने इसका हमको कभी दिखाई नहीं देती। परन्तु उत्तर यह दिया है, कि जैसे स्वच्छ पानीमें सूर्यकी विरुद्ध दिशासे पृथ्वीकी छाया जब पड़ा हुवा प्रतिबिम्ब साफ दिखाई देता चन्द्र पर आती है, तब वह दिखाई देने है, वैसे ही जिस समय इन्द्रियाँ और अन्तः. लगती है; और जबतक वह चन्द्र पर करण सब शुद्ध होते हैं, उस समय उसमें रहती है, तभीतक दिखाई देती है। परन्तु पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब अर्थात् आत्मा शुद्ध चन्द्र के पास आते हुए, अथवा चन्द्रसे और आनन्दयुक्त होता है। परन्तु जिस छूटते समय दिखाई नहीं देती। यह दृष्टान्त समय इन्द्रियाँ गँदली होती है, उस समय