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महाभारतमीमांसा

® महाभारतमीमांसा %3- - गुण अधिक रहता है। प्राकाश, वायु, है। इसी लिए भगवदगीताने, “अपरस्परस अग्नि, जल और पृथ्वी, इन क्रमशः चढ़ते भूतं किमन्यत्कामहेतुकम्" इत्यादि हुए तत्वों में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध- वचनोंसे इसका निषेध किया है। के विशिष्ठ गुण हैं: और प्रत्येक तत्वों जीव-कल्पना। पिछले तत्वके भी गुण रहते हैं । अर्थात् इससे यह सिद्धान्त निकलता है कि सम्पूर्ण जड़ सृष्टिका पृथक्करण निधित पृथ्वीमें पाँच, जलमें चार, अग्निमें तीन, हो जाने पर पंचमहाभूतों और उनके वायुमें दो और आकाशमें एक गुण है। भिन्न भिन्न पाँच गुणोंको कल्पना करना यह सिद्धान्त सब भारती तत्वज्ञानियों- स्वाभाविक और सहज है । तन्वज्ञानके को मान्य है। यह तो उनका आधार विचारकी यही पहली सीढ़ी है। इस ही है। महाभारतमें जब किसी तत्व- विषयमें पाश्चात्य और प्राच्य तत्वज्ञानो. झामका विचार शुरू होता है, तब पाँच में-दर्शनोंमें-बहुत मत-भेद भी नहीं है। महाभूतों, पंचेन्द्रियों और चढ़ते हुए परन्तु इसके आगेकी सीढ़ी कठिन है। परिमाणसे पाँच गुणोंका विवेचन अवश्य पंचमहाभूतों और पंचेन्द्रियोंके अति- किया जाता है । हाँ, चार्वाकके नास्तिक रिक्त और भी इस संसारमें कुछ है मतमें अवश्य ही यह सिद्धान्तमान्य , या नहीं ? इच्छा, बुद्धि, अहंकार, इत्यादि नहीं है। चार्वाक केवल प्रत्यक्ष-प्रमाण- बाते जड़ हैं, अथवा जड़से भिन्न हैं ? वादी थे, अतएव उन्होंने चार ही यह प्रश्न बहुत कठिन है कि जड़से भिन्न तत्व स्वीकार किये हैं। ग्रीक लोगोंकी कोई पदार्थ है अथवा नहीं। और, इस भाँति वे पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु, 'प्रश्नके विषयमें सब काल और सब इन्ही चार तत्वोंको मानते हैं। वे इन लोगों में मतभेद रहा है। पहलेपहल यह तत्वोंको स्वतंत्र भी मानते हैं । वे यह कल्पना होना स्वाभाविक है कि, जीव भी मानते हैं कि, परमेश्वर नहीं है। अथवा अात्मा जड़से भिन्न है । अत्यन्त और जब कि परमेश्वरने सृष्टि उत्पन्न ही जङ्गली लोगोंमें भी यह कल्पना दिखाई महीं की, तब उनको यह भी माननेकी देती है। परन्तु कितने ही लोगोंने यहाँतक आवश्यकता नहीं कि, चारों भूत एक कहनेका साहस किया है कि, जीव अथवा दूसरेसे निकले । सच पूछा जाय तो यही आत्मा है ही नहीं। तत्वज्ञानके विषयमें समझमें नहीं आता कि चार्वाक अथवा दसरा विचार यही है । नास्तिक लोगोंने नास्तिक मतको तत्वज्ञान क्यों कहा जाय: ऐसा निश्चित किया है कि, जगत्का चेतन क्योंकि इन लोगोंकी यह धारणा होती है अनुभव किसी भिन्न जीवका परिणाम नहीं कि, साधारणतः बुद्धि और इन्द्रियों- है: किन्तु जिस प्रणालीसे पंचमहाभूत को जो ज्ञान होता है, अथवा उनके अनु- शरीरमें एकत्र हुए हैं, उस प्रणालीका भवमें जो पाता है उसके आगे कुछ भी यह एक विशिष्ट गुण है। इस विषयमें नहीं है। ऐसी दशामें यही समझमें नहीं नास्तिकोंके जो तर्क हैं, उनका स्वरूप शांति आता कि, उसके मतको तत्वज्ञान, अथवा पर्वके २१ चे अध्यायमें, पंचशिख और दर्शनशास्त्र क्यों कहा जाय । अवश्य ही जनकके सम्बादमें, स्पष्टतया दिखलाया वह मत बहुत पुराना है; और यही नहीं, गया है। नास्तिकोका कोई प्राचीन ग्रन्थ बल्कि इसका अस्तित्व सदासे चला आता प्राजकल उपलब्ध नहीं है। जैसा कि हम