पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/४९१

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- प्रत्वका भी कर्तव्य है और यदि इसमें कि यदि संन्यासियों और योगियोंको भी दाताको खयं उपवास भी करना पड़े तो अपने मोक्ष-मार्गमें सिद्धि प्राप्त करनी हो कोई हानि नहीं है । वनपर्व अध्याय २६० तो उन्हें भी इसी नीति-मार्गका अवलम्ब में जो मुगल ऋषिका आख्यान दिया करना चाहिए । महाभारतमें प्रारम्भसे के मया है उसका यही तात्पर्य है । यह कर इति पर्यन्त नीतिके आचरणकी प्रत्या ऋषि पन्द्रह दिनमें द्रोण भर भान कपोन- न्न उदान स्तुति की गई है। इसके अति- दृसिसे प्रामकर और दस पौर्णमास रिक्त, प्राचारको धर्मका एक प्रधान प्रह समान कर देवता और अतिथिकी पूजा माना गया है । सदा जो यह कथन पाया करता था और उससे जितना अन्न बच जाता है कि प्राचार प्रथम धर्म है, सो जाता था, उतनेसे ही अपना उदर- ठीक ही है क्योंकि मनुष्यके मन में नीति- निर्वाह करता था । ऐसा लिखा है कि का चाहे कितना ही आदर क्यों न हो, उसने इस रीतिसे दुर्वासा ऋषिका परन्तु जबतक वह आचरणके द्वारा सत्कार बारंबार किया और आप उपासा: उयक्त नहीं किया जाता, तबतक उस रहा । इस कारण अन्नमें उसे स्वर्गमें श्रादरका कुछ मूल्य नहीं । केवल प्राच. ले जानेके लिए विमान पाया। अतिथि- 'रण शब्दसे नीतिमत्ताके आचरणके सिवा सत्कारके पीछे जो अन्न शेष रह जाता है. कुछ और विधि-निषेधात्मक अन्य प्राच. उसका नाम 'विघस' है। और यह नियम ' रणोंके नियमोंका भी बोध होता है जो था कि यह विघस खाकर गृहस्थ-धर्मवाले सनातन भारती धर्मके प्राचारमें समा. स्त्री-पुरुषोंको उदर-निर्वाह करना चाहिए। विष्ट है । यह समझा जाता था कि इस साधारण धर्म। आचारसे मनुष्यको दीर्घायु प्राप्त होती है। अनुशासन पर्वके १०४ थे अध्यायमें भारती मनातन धर्मके भिन्न भिन्न ' प्राचारका विस्तृत वर्णन है। वह यहाँ भाग बतानेके पश्चात अब उन धौकी संक्षेपमें लिखने योग्य है । "प्राचार ही ओर चलना चाहिए जिनका पालन धर्मका लक्षण है । साधु-सन्तोको जो करना सभी मनुष्योंको सभी समय श्रेष्ठता प्राप्त होती है, उसका कारण उनका भाषश्यक है। सत्य, सरलता, क्रोधका सदाचार ही है। मनुष्यको न कभी झूठ अभाव, अपने उपार्जित किये हुए द्रव्य- | बोलना चाहिए और न किसी प्राणीकी का अंश सबको देना, सुख-दुःस्वादि द्वन्द्व हिंसा करनी चाहिए ।" इस प्रकार सहना, शान्ति, निर्मत्सरता, अहिंसा, , नीतिक नियम बतलाकर आगे विशिष्ट शुचि और इन्द्रिय-निग्रह, ये सब धर्म आचागेका जो वर्णन किया गया है, उसका सपके लिए एकसे कहे गये हैं, और ये सारांश नीचे दिया जाता है । अन्तमें मनुष्यको सद्गति देनेवाले हैं। तात्पर्य यह है कि सय धर्मोके समान प्राचार। भारतीय सनातन धर्मका सम्बन्ध नीति ___“मनुष्यको ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर के साथ मिलाया गया है । नीतिके प्राच- धर्मार्थका विचार करना चाहिए । प्रातः- रणके बिना धर्मकी पूर्ति कभी नहीं हो कालीन मुख-मार्जन आदि करके, हाथ सकती । यह बात महाभारतके समयमें जोड़कर, पूर्वाभिमुख हो सन्ध्या-धन्दन मान्य की जाती थी । म्पट कहा गया है करना चाहिए। प्रातःकाल और साप-