पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/४७५

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ॐ धर्म । ॐ तत्पर रहते थे । महाभारतके किसी देख पड़ता कि कहीं समय पर सभ्या क्षत्रिय योद्धाको देखिये, उसे वेदविद्या करना राम और लक्ष्मण भूल गये हों, कण्ठानथी और वह विद्या अवसर पर उप- इसी तरह समझौतेके लिए जाते हुए स्थित भी रहा करती थी । वेदविद्या पारङ्ग- श्रीकृष्णका जो वर्णन महाभारतमें है, उसमें सताके सम्बन्ध राम और युधिष्ठिरका प्रातः-सायं सन्ध्या करनेका वर्णन करने में वर्णन सदा पाता है। परन्तु देख पड़ता कविने भूल नहीं की। सन्ध्यामें मुख्य है कि भारती कालके अन्तमें महाभारत- भाग था उपस्थान करना, जो वैदिक कालके लगभग, क्षत्रिय लोगतक विद्या- मन्त्रोंसे किया जाता है। लिखा है कि की ओर दुर्लक्ष्य करने लगे । अनेक भारती युद्ध के समय समस्त क्षत्रिय ब्राह्मण भी जब वेद-विहीन हो गये देख प्रातः स्नान करके सन्ध्यासे छुट्टी पाकर पड़ते हैं, तब क्षत्रियोंकी बात ही क्या ? रणभूमि पर सन्नद्ध होते थे। रातको उस समय वेदविद्यामें क्षत्रियोंका प्रवीण एक ही दिन युद्ध हुआ और समस्त होना उनकी एक न्यूनता समझी जाने सैनिकोंने युद्धभूमिमें ही आराम किया। लगी। कर्णने युधिष्ठिरका उपहास करके उस समयका वर्णन है कि प्रातःकाल कहा है- होनेसे पहले ही युद्ध छिड़ गया, तब · ब्राह्म भवान्बले युक्तः स्वाध्याये सूर्य निकला । उस समय, समस्त सैन्यमें यज्ञकर्मणि । मास्म युध्यस्व कौन्तेय मास्स युद्ध रुक गया और सभी क्षत्रियोंने रणा- वीरान्समासदः ॥ ङ्गणमें ही सन्ध्या अर्थात् सूर्यका उपस्थान ब्राह्मणोके कर्तव्य अर्थान् वेद-पाठ किया। इससे देख पड़ता है कि भारत- करनेमें और यज्ञ करनेमें तुम प्रवीण 'कालमै सन्ध्या और सूर्य के उपस्थानका हो, परन्तु न ना तुम युद्ध करनेके कितना माहात्म्य था (द्रोणपर्व १० १८६)। लिए आगे बढ़ी और न वीरोंस मुका- "पूर्वमें अरुणके द्वारा ताम्रवर्णीकृत रवि. बिला करी। (कर्ण० अ०४६)। तात्पर्य , मगडल सोनेके चक्रकी भाँति दिखाई देने यह कि, उस समय वीरको वेदविद्याका लगा: तब उस सन्ध्या समयमें कौरव पाना एक न्यूनताका लक्षण माना जाने और पागडव दोनों ओरके योद्धा अपने लगा था। परन्तु इससे प्रथम अर्थात् अपने रथ, घोड़े और पालकी आदि रामके समय वह परिस्थिति न थी। राम सवारियाँ छोड़ छोड़कर सूर्यकी ओर जिस प्रकार धनुर्विद्यामें अग्रणी थे, उसी : मुँह करके, हाथ जोड़कर जप करने प्रकार वेदविद्यामें भी थे। रामायणमें लने ।" इससे यह भी देख पड़ता है कि ऐसा ही वर्णन है। प्रातः सन्ध्याके समयको अर्थात् सूर्यके वैदिक भाह्निक, सन्ध्या और उदय होनेके समयको निकलने न वादक श्राहक, सन्ध्या आर देनेकेसम्बन्ध भारती-युद्ध-कालके समन होम।

भारती आर्य सावधान रहते थे। किंब-

स्पष्ट देख पड़ता है कि प्रत्येक आर्य । हुना, ऐसे अवसर पर स्नान करनेकी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य प्रति दिन भी आवश्यकता न मानी जाती थी। सन्ध्या एवं यक्ष किया करते थे। कमसे क्योंकि यहाँ रणभूमिमें स्नान करके सूर्यो- कम भारती योद्धाोके वर्णनमें इस बात- पस्थान करनेका वर्णन नहीं है। की कहीं कमी नहीं है । जिस तरह यह नहीं दृसरा कर्तव्य था अग्निमें आहुति