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महाभारतमीमांसा
  • महाभारतमीमांसा

-- धर्म। पन्द्रहका प्रकरण। स्तुतियाँ जिस ऋग्वेदमें हैं, वह ऋग्वेद भारती युद्ध कालमें सम्पूर्ण हो गया था और उसके विषयमें लोगोंकी यह पूज्य बुद्धि प्रस्थापित हो चुकी थी कि यह आर्य- धर्म प्रतिपादक मूल दैवी प्रन्थ है। इसी प्रकार यजुर्वेद और सामवेद भी सम्पूर्ण यह कहनेकी आवश्यकता नहीं कि भारती हो गये थे और उनके विषयमें धर्मश्रद्धा कालके प्रारम्भसे भारती पार्योंका स्थिर हो गई थी। ऋषियोंने भिन्न भिन्न धर्म वैदिक था। वैदिक कालके अन्तमें देवताओंके जो स्तुति-प्रधान सूक्त बनाये भारतीयुद्ध हुआ। इस युद्ध में जो भिन्न भिन्न हैं, उनकी रचना म्वयं ऋषियोंके द्वारा जनसमुदाय थे वे वैदिक धर्मके अभि- नहीं हुई, किन्तु परमेश्वरी प्रेरणासे अथवा मानी थे, इसमें अचरजकी कोई बात उसकी इच्छासे ऋषियोंके मुखसे वे नहीं। वैदिक धर्मके मुख्य दो अङ्ग थे, । सहज ही निकल पड़े हैं। भारत-कालमें ईशस्तुति अथवा स्वाध्याय और यज्ञ । ऐसी दृढ़ धारणा पूर्ण हो गई थी । अर्थात् प्रत्येक मनुष्यको ये दोनों काम प्रति दिन । उस समय पक्की धारणा हो गई थी कि करने पड़ते थे । वैदिक धर्ममें अनेक । वेदोंके सूक्त अपौरुषेय हैं । ऋग्वेदमें देव- देवता है। और, ये देवता सृष्टिके भिन्नताओंको स्तुतिके मन्त्र थे। और यजुर्वेद- भिन्न भौतिक चमत्कार--मेघ, विद्युत्, में यज्ञ-यागकी क्रिया बतलाई गई थी। आदिके अधिष्ठाता स्वरूप माने जाते हैं। ऋग्वेदके सूक्तोंसे ही सामवेद बना था, इनमें इन्द्र, सूर्य, विष्णु और वरुण मुग्न्य : और ये मूक्त सिर्फ पढ़ने के लिए न थे, हैं । भौतिक स्वरूपके साथ इन देवताओं- किन्तु गानेके लिए थे । अर्थात् सामवेद- का तादात्म्य करनेकी यहाँ पर आवश्य- का पउन गानेकी भाँति था। यह नियम कता नहीं। यद्यपि भिन्न भिन्न देवता था कि तीनों वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद और भिन्न भिन्न भौतिक शक्ति-स्वरूप कल्पित । सामवेद, प्रत्येक आर्यको मुखान कर किये गये हों, तो भी समस्त देवताओंका लेने चाहिएँ । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य एकीकरण करनेकी प्रवृनि भाग्नी पार्यो- तीनों वर्गों के लोग वेदविद्या पढ़ते थे। में प्राचीन कालसे ही थी। बाल्यावस्थामें प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य ___उनके मतानुसार ईश्वर एक है और वेद पढ़नेका था । कमसे कम एक न एक ये भिन्न भिन्न स्वरूप उसीके हैं। यही : वेद प्रत्येकको याद रखना पड़ता था। नहीं, किन्तु समस्त जगत और ईश्वर भी यह उनका धार्मिक कर्तव्य था। अनुमान एक ही है। एक शब्दमें कहें तो मृष्टि किया जा सकता है कि भारती युद्धकाल- और स्रष्टा एक ही है, अलग नहीं । जैसा में लोग इस कर्तव्यका पालन बहुत कुछ कि मेक्समूलरने कहा है, इसी प्रवृत्तिसे श्रद्धासे करते थे । कदाचिन् वैश्य लोग एक देवताको अन्य समस्त देवताओंका अपने व्यवसायकी अड़चनके कारण, स्वरूप देना अथवा उसमें सर्वेश्वरको महाभारत-कालमें, वेद-विद्या पढ़ना धीरे कल्पित करना भारती आर्योंके लिए बहुत धीरे छोड़ने लगे होंगे। ही सहज था। इन देवताओंकी ऐसी किन्तु भारती युद्ध-कालमें क्षत्रिय एकत्व-प्रतिपादक कल्पनाओंसे भरी हुई और ब्राह्मण लोग वेदविद्यामें एक हीसे