पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/४६३

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8 साहित्य और शास्त्र । * इस तण्डिने शिवका सहस्रनाम बनाया। मान्य हो गई । सूर्यसे मुझे १५ यजुर्मन्त्र यदि यह न माना जाय कि महाब्राह्मणके प्राप्त हुए । रोमहर्षणके साथ मैंने पुराणों- कर्ता तण्डिने ही यह शिवसहस्रनाम का भी अध्ययन किया।” इस वर्णनसे बनाया है, तो सम्भव है कि उसे उप- कई एक महत्वपूर्ण अनुमान निकलते हैं। मन्युने बनाया होगा। अनुशासन पर्वके पहला यह कि यजुर्वेदी वैशम्पायन और १७ वें अध्यायमें यह कहा गया है। अनु- याशवल्काके झगड़ेके कारण शुक्ल यजु. शासन पर्वके १६ वें अध्यायमें तण्डिका वैदकी उत्पत्ति हुई। याज्ञवल्क्यने उसे वृत्तान्त है। शुक्ल यजुर्वेदमें शतपथकी सूर्यसे प्राप्त किया। उसमें पन्द्रह मन्त्र कथा महाभारतमें शान्ति पर्वके ३१८ वे सूर्यने अलग दिये है, और बाकी पुरानी अध्यायमें है। इन दोनोंका कर्ता याक्ष- शाखाओंके ही हैं । (सिर्फ इनके पढ़नेकी वल्क्य है । उसने अपने मामा वैशंपायनसे पद्धति ही कृष्ण यजुर्वेदसे भिन्न है)। यजुर्वेद पढ़ा था: परन्तु मामाके साथ ' इस वेदका प्रसिद्ध शतपथ-ब्राह्मण याक्ष- कुछ झगड़ा हो जानेसे उसने वह वेद । वल्क्यने ही बनाया है। सिर्फ इसी ब्राह्मण के (वमन) कर दिया और सूर्यकी में स्वर हैं (अन्य वेदोंके ब्राह्मणों में स्वर नहीं आराधना करके उसने नवीन यजुर्वेद हैं, उनमें स्वरहीन गद्य है ) इससे जान उत्पन्न किया। आख्यायिकाके अनुसार पड़ता है कि यह ब्राह्मण सबसे पुराना यही शुक्ल यजुर्वेद है। सूर्यने उसे यह वर- ' होगा। इस कथासे इसका रचना-काल दान दिया था कि-"दूसरी शाखाओस भी देख पड़ता है। अर्थात् यह ब्राह्मण ग्रहण किये हुए प्रकरणों एवं उपनिषदों भारती-युद्ध के पश्चात्रचा गया है। क्योंकि समेत साग यजुर्वेद तुझमें स्थिर होगा व्यास-शिष्य सुमन्तु, जैमिनि, पैल और और तेरे हाथसे शनपथकी रचना होगी।" वैशम्पायनका समकालीन यह याज्ञवल्क्य इसके अनुसार याज्ञवल्क्यने घर आकर था : किम्बहुना उसके शिष्य-वर्गमें था। सरखतीका ध्यान किया । सरस्वतीके प्रारम्भमें हम अन्तः प्रमाणोंसे निश्चित प्रकट होने पर उसकी और प्रकाशदाता कर चुके हैं कि भारतीय युद्धके पश्चात् सूर्यकी पूजा करके उसने ध्यान किया। शतपथ-ब्राह्मण बना है और उससे तब, कथाके वर्णनासुर, याज्ञवल्क्य स्वयं : भारती-युद्धका समय भी निश्चित किया अपने विषयमें जनकसे कहते हैं- "संपूर्ण गया है । उल्लिखित कथासे देख पड़ता है शतपथ, रहस्य, परिशिष्ट और अन्य कि महाभारतके समय यही दन्तकथा शाखाओंसे लिये हुए भागों समेत में परम्परासे मान्य थी । याज्ञवल्क्यने सिर्फ आर्विभूत हो गया। इसके पश्चात् मैंने जुदा शुक्ल यजुर्वेद ही नहीं बनाया, सौ शिष्य इसलिए किये कि जिसमें मामा- बल्कि पुराने यजुर्वेदके साथ झगड़ा करके को बुरा लगे। फिर जब तेरे (अर्थात् यज्ञमें उस वेदके लिए प्राप्त होनेवाली जनकके) पिताने यज्ञ किया, तब यत्रका दक्षिणामें वैशम्पायनसे आधा हिस्सा भी सारा प्रबन्ध मैंने अपने हाथमें लिया और ले लिया। इस प्रकार यह कथा बहुत ही बेदपाठकी दक्षिणाके लिए वैशम्पायनसे मनोरअक और ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्व- झगड़ा करके-देवताओंके समक्ष-आधी पूर्ण है। दक्षिणा ले ली। सुमन्त, जैमिनि, पैल तेरे इसके सिवा वनपर्वके १३८ वं पिता और अन्य ऋषियोंको यह व्यवस्था अध्यायमें वर्णन है कि अर्वावसुने रहस्य