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महाभारतमीमांसा

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  • महाभारतमीमांसा

उस समय घेदान्त, सांख्य और योग यही कर कहा है कि ये सब एक ही नारायण- तीन तस्वज्ञान प्रचलित थे और इन्हींके के उपासना-मार्ग हैं:- . एकीकरणका प्रयत्न भगवद्गीताने किया सर्वेषु च नृपश्रेष्ठ शामेष्वेतेषु दृश्यते। है। उसी प्रथलको सौतिने अपने समयमें यथागमं यथाशानं निष्ठा नारायणः प्रभुः॥ जारी रखा और उक्त दो नये मतोंके अर्थात्-“हे श्रेष्ठ नृप, यद्यपि इतने विचार भी उसने अपने प्रयत्नमें शामिल भिन्न भिन्न पन्थ हैं, तथापि इन सबमें एक कर लिये । इसके लिये सौतिने महाभा- बात समान देख पड़ती है। वह यह है स्तमें अनेक उपाख्यान और प्रकरण जोड़ कि इन सब मतोंमें पागम और शानके दिये हैं। पूर्वप्रचलित वेदान्त, सांख्य और अनुसार जो परम-गति निश्चित है वह योग इन तीनो मतोंका भी आविष्करण, प्रभु नारायण ही है।" उनकी उन्नतिके अनुसार. उसने अपने सांख्य, योग आदि भिन्न भिन्न तत्त्व- अन्धमें किया है। ऐसे प्रयत्नका नमूना शानों में जो विरोध था उसको हटाकर "अनुगीता" है। यह सौतिका बनाया हुश्रा इन सषमतोमें सौतिकेमहाभारतने एकता नया प्रकरण है। इसके सिवा, सांख्य, कैसे स्थापित की. इस बातकी विस्तार योग और वेदान्त-सम्बन्धी मतोंका सहित चर्चा करनेकी यहाँ आवश्यकता विस्तार-सहित प्रतिपादन करनेवाले नहीं है। आगे चलकर इस विषयका अनेक अध्याय स्थान स्थान पर, विशेषतः विस्तारपूर्वक वर्णन किया जायगा। सना शान्ति-पर्वमें, पाये जाते हैं। पूर्व कथनके तन धर्मके अन्य और आवश्यक अङ्ग भी अनुसार पाश्चरात्र-मतका आविष्करण हैं; जैसे यज्ञ, याग, तीर्थ, उपवास, व्रत, नारायणीय उपाख्यान जोड़कर किया दान इत्यादि । इनका भी विस्तृत वर्णन गया है। आश्चर्य की बात है कि महा- महाभारतमें स्थान स्थानपर सौतिने किया भारतमें पाशुपत-मतका उद्घाटन सौतिने है। यह वर्णन विशेषतः अनुशासन पर्वमें विस्तार-सहित नहीं किया । इसमें सन्देह पाया जाता है। हिंसाका विषय यक्षके नहीं कि यह मत उस समय प्रचलित था सम्बन्धमें बहुत महत्त्वका है। सनातन- और सौतिने उसका स्पष्ट रीतिसे उल्लेख धर्मावलम्बियोंमें बौद्धोंके पूर्वसे ही यह भी किया है । सौतिके महाभारतके समय वादविवाद हो रहा था कि यक्ष पशुका जो मत प्रचलित थे उनका उल्लेख इस बध किया जाय या नहीं । वैदिक मतके प्रकार किया गया है:- अभिमानी लोग पशुवधको आवश्यक सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाःपाशुपतं तथा। मानते थे। सौतिने दोनोके मतोको मान्य शानान्येतानिराजर्षे विद्धि नानामतानिवै॥ समझकर महाभारतमें उनको स्थान दे उमापतिर्भूतपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः। दिया है। इस सम्बन्धमें उसने एक पूरा उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः। अध्याय ही लगा दिया है। जब युधिष्ठिर- पाश्चरात्रस्य कृस्त्रस्य वेत्तातु भगवान स्वयं॥ के अश्वमेध यज्ञका पूरा पूरा वर्णन हो (शां० प्र० ३४६.६४-६८) हिंसाका वर्णम सर्वसाधारणको कुछ चुका, तब सम्भव है कि उसमें की हुई . इस प्रकार पाशुपत और पाश्चरात्र दो खटकने लगा हो। "अनेक देवतामोके मिन. मतोंका स्पष्ट उल्लेख महाभारतमें उद्देशसे अनेक पशु-पक्षी सम्भेसे काँधे किया गया है। परन्तु सौतिन आगे चल-गये; उत्कृष्ट मुख्य प्रवरखके अधि-