पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/४५९

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  • ज्योतिर्विषयक ज्ञान । *

कोई यन्त्र था या नहीं, इस बातका भाग, यानी संहिता और जातक विषय- विचार करते हुए नीचे लिखे श्लोकसे यह । में दो शब्द लिखने चाहिएँ। ये भाग कल्पना की जा सकती है कि ऐसा एक अबतक अलग अलग नहीं हुए थे और न एक यन्त्र अथवा चक्र महाभारत-काल- उनकी विशेष उन्नति भी न हुई थी। मेरहा होगा। वन पर्वके १३३व अध्याय-तथापि ये बातें मान ली गई थी किनाना में कहा है- प्रकारके उत्पात और दुर्भिक्ष आदि आप- चतुर्विंशतिपर्व त्वां षगणाभिद्वादश प्रधि । त्तियाँ ग्रहोंकी चाल पर अवलम्बित हैं: तत्रिषष्टिशतारं वै चक्रं पातु सदागति ॥ किंबहुना मनुष्यका सुख-दुःख जन्म-नक्षत्र हे राजन् ! वह चक्र तुम्हारा सदा पर अवलम्बित है: और इस दृष्टिले गर्ग कल्याण करे जिसमें चौथीस पर्व हैं. छः श्रादि ज्योतिषियोंकी खोज और कल्पनाएँ नाभियाँ अथवा तूंबे हैं और बारह घेरे जारी थीं। उदाहरणके लिए अगले श्लोक- तथा ३६० पारे हैं। यह बात अष्टावक्रने में,अवर्षणके साथ शुक्रकासम्बन्ध देखिए। कही है। यह रूपक संवत्सर-चक्रका है। भृगोः पुत्रः कविर्विद्वान् शुक्रः कवि- संवत्में चौबीस पौर्णिमा अमावस्याएँ तो सुतो ग्रहः । त्रैलोक्यप्राणयात्रार्थं वर्षावर्षे पर्व है, छः ऋतुएँ नाभि और बारह धेरै भयाभये ॥ स्वयम्भुवा नियुक्तः सन् भुवनं यानी महीने, तथा ३६० दिन ही पारे हैं। परिधावति ॥४२॥ (अनु० अ०३६) यह चक्र बहुत पुराना है और वैदिक इस प्रकारके वाक्य भारती-युद्धके साहित्यमें भी पाया जाता है । इस चक्रसे सम्बन्धमें बहुतेरे हैं । समस्त समाज आकाशस्थ ग्रहोंके वेध लेनेका चक्र उत्पन्न अथवा प्रत्येक व्यक्तिके सुख-दुःख ग्रहों होना असम्भव नहीं है। ऐसे एक आध पर अवलम्बित रहते हैं। इस सम्बन्धके चक्रके बिना सूर्यकी दक्षिण और उत्तर- संहिता और जातकशास्त्र, महाभारतके गतिका सूक्ष्म ज्ञान एवं दिशाओंका भी पश्चात् यूनानी और खाल्डियन ज्योति- सूक्ष्म ज्ञान होना सम्भव नहीं । इतिहास- षियोंके मतोंकी सहायता प्राप्त कर, आगे से सिद्ध है कि भारत-कालमें आर्योको बहुत अधिक बढ़ गये। परन्तु यहाँ पर इन दोनों यानोंका मूक्ष्म ज्ञान हो गया था। उसका विशेष उल्लेग्व करने की आव- ज्योतिष शास्त्रके दूसरे स्कन्ध अथवा 'श्यकता नहीं।