पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/४५

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  • महाभारतके करता

१६ जोड़ा हुआ है (अध्याय ३३४-३४८)। सौतिने वन पर्वमें रखा है। इस प्रकार इसका संग्रह पाश्चरात्र मतसे किया भिन्न भिन्न उपास्य देवताओंको एक ही हुआ मालूम पड़ता है। स्वभावतः मूल | ग्रन्थमें विरोध-रहित स्थान देकर सौतिने पाश्चरात्र-मतमें यह वर्णन होगा कि सनातन-धर्मकी एकता करनेका प्रशंसनीय शङ्करं विष्णुसे छोटे हैं और उनके भक्त कार्य किया है। हैं: परन्तु सौतिने मतैक्य करने के प्रयत्नके इसीके साथ भिन्न भिन्न मतों और अनुसार, अपने वर्णनमें, थोड़ा सा परि- मोक्ष-मागौंका एकीकरण करनेका यत्न भी बर्तन कर दिया। वह यह है कि जब सौतिको करना पड़ा है। उस समय भिन्न नारायण और शङ्करके युद्ध में किसीको भिन्न उपासनाओंके साथ भिन्न भिन्न भी जय न हुई, तब ब्रह्माने शङ्करकी | तत्त्वज्ञानोंका भी प्रचार हो रहा था। इन प्रार्थना करके उन्हें नारायणका भक्त बना विषयोंके सम्बन्धमे जो ग्रन्थ इस समय दिया। उस समय नारायणने कहा-"जो प्रमाणभूत माने जाते हैं वे उस समय नहीं तुम्हारा भक्त है वह मेरा भी भक्त है। थे। इस बातका उल्लेख पहले किया जा जिसने तुम्हें पहचान लिया उसे मेरा भी चुका है। हाँ, इसमें सन्देह नहीं कि उन शान हो गया। तुममें और मुझमें कुछ | विषयोंका उपदेश अन्य ग्रन्थोके द्वारा भी भेद नहीं है। तुम्हारे शलके प्रहारका मुखस किया जाता था और उनमें चिह्न मेरे वक्षस्थल पर अङ्कित है, इसलिये पारस्परिक विगंध भी बहुत ज़ोर शोर- सब लोग मुझे श्रीवत्स कहेंगे: और मेरे से बढ़ रहा था । सौतिके लिये इस हाथ का चिह्न तम्हारे कराठ पर अडित है बातकी आवश्यकता थी कि इस विरोधका इसलिये सब लोग तुम्हें श्रीकण्ठ कहेंगे।" नाश किया जाय। इस प्रकार वेदान्त, इस प्रकार पाश्चरात्रके मतको भी सौतिने सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, पाशुपत आदि शिव और विष्णुकी एकताकी ओर झुका अनेक मनोका एकीकरण करना उसके दिया है। लिये आवश्यक था। यहाँ यह प्रश्न अत्यन्त ___ सौतिने महाभारतके भीष्म पर्व महत्वका है, कि भगवद्गीता मूल भारतकी (अध्याय २३) में देवीकी स्तुतिको स्थान है यासौतिकी बढ़ाई हुई है। यह बात सिद्ध दिया है । यथार्थमें यह स्तुति यहाँ न होती हो चुकी है कि कमसे कम दो अन्योंका तो अच्छा होता । इसका कारण यह है यानी भारत और महाभारत का होना कि लड़नेके लिये उत्सुक अर्जुनको जब हमेशा ही मानना पड़ता है; और दो ग्रन्थ- दुर्गादेवीने यह वरदान दे दिया कि युद्ध में कारोंका यानी व्यास-वैशम्पायन तथा तेरी जीत होगी, तब आगे चलकर भग- सौतिका होनाभी अवश्य मानना पड़ता है। वगीताके लिये कोई प्रसङ्ग ही नहीं रह इतना करने पर भी भगवद्गीता-सम्बन्धी जाता। तब तो अर्जुनके मन में यह शङ्का प्रश्न ज्योंका त्यों बना रहता है। हमारी ही नहीं रह सकती थी कि “यद्वा जयेम रायमें भगवद्गीता मूल महाभारतकी है। यदि वा नो जयेयः सौतिका कथन है | उसे सौतिने किसी दूसरे स्थानसे लेकर कि श्रीकृष्णकी ही प्राशासे अर्जुनने इस महाभारतमें घुसेड़ नहीं दिया है। इस दुर्गा-स्तोत्रका जप किया था । दुर्गाकी विषयका विस्तृत विवेचन अन्तमें किया स्तुति अन्य स्थानों में भी पाइ जाता है। जायगा। पाश्चरात्र और पाशुपत दोनों खैर: स्कन्दकी मनुति और प्रशंसाका भाग मतोंका प्रचार गीनाकं समय नहीं था।