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महाभारतमीमांसा

R महाभारतमीमांसा लम्बी चौड़ी टीका की है । “इस पर कुछ यही गणना दी हुई है। इस समय हिन्दु- लोगोंका यह कहना है कि उस जमानेमें स्थानमें दोनों रीतियाँ प्रचलित हैं । नर्मदाके कृष्णपक्ष प्रथम रहता था। किन्तु यह उत्तरमै संवत्के साथ पूर्णिमान्त महीना कथन भ्रान्त है: क्योंकि पक्षके लिए पूर्व प्रचलित है, और दक्षिणमें शक-वर्ष के और अपर, सुदी और बड़ी, ये संज्ञाएँ साथ अमान्त महीना प्रचलित है। हैं। इसी तरह पौर्णिमाका नाम पूर्णिमासी साधारण रीतिसे महीना ३० दिनका है। इससे कुछ यह अर्थ नहीं लेना है कि माना जाता था और प्रत्येक पन्धरवाड़े यहाँ महीना पूरा हो जाता है; किन्तु मास (पखवाड़े) में पन्द्रह तिथियाँ मानी जाती शब्दका अर्थ चन्द्र भी है और इसीसे थी। तिथियोंके नाम प्रतिपदा, द्वितीया पौर्णिमाको पूर्णमासी कहते हैं ।" यहाँ श्रादि संख्या पर थे । परन्तु चन्द्रका पर सिर्फ इतना ही कहना है कि समस्त सूर्यसे सङ्गम उन्तीस दिनों में और कभी भाषाओमें चन्द्र और महीनेका निकट कभी अट्ठाईस दिनोंमें ही हो जाता है। इस सम्बन्ध है। अंग्रेजीम भी 'मन्थ' शब्दका कारण एक श्राध पखवाड़ेमें एक या दो 'मून' (चन्द्र) शब्दले सम्बन्ध है । इसी : तिथियाँ घट जाती थीं अथवा कभी कभी तरह संस्कृतमें 'मास' शब्द मूलमें चन्द्र- । एक तिथिज्यादा भी हो जाती थी। चन्द्रका वाचक है, फिर महीनेका बोधक हो गया । ग्रहगणित जिस समय मालूम न था, उस है। फारसीमें भी माह शब्द चन्द्रवाची समय पहलेसे समझमें न आता था कि है: उसका अर्थ भी महीना हो गया है। किस पखवाड़ेमें कितनी तिथियाँ होंगी: इस सम्बन्धमें कोई आश्चर्य नहीं: क्योंकि और यह बात अन्तमें प्रत्यक्ष अनुभवके सभी लोगोंमें पहले महीने चन्द्रमे निश्चित भरोसे ही छोड़नी पड़ती थी। महाभा- किये गये थे । हाँ, बहुतेरे स्थलों पर रतसे प्रकट होता है कि भारती कालमें चन्द्र पूर्ण होने पर महीना गिननेकी ' एक ऐसा भी समय था । जिस तरह अरब रीति थी। इसी प्रकार भारती लोगोंमें लोग इस समय भीप्रत्यक्ष चन्द्रको देखकर भी पूर्ण चन्द्रसे महीना गिनने की गति तदनुसार महीना मानते हैं, वही दशा रही होगी और महाभारतमें उसका पहले, एक समय भारती पार्योंकी थी उल्लेख श्रादि क्वचित् पाया जाता है। और पहलेसे ही तिथिकी वृद्धि अथवा वैदिक साहित्यमें तो वह है ही। परन्तु । क्षयको जान लेना उनके लिए कठिन निश्चय है कि महाभारतके समय उत्सरी था । भीष्मपर्वके प्रारम्भमें धृतराष्ट्रसे हिन्दुस्थानमें-निदान पञ्जाबमें-यूना- व्यास कहते हैं- नियोको अमान्त महीने प्रचलित मिले। चतुर्दशी पञ्चदशी भूतपूर्वांच षोडशीम् । महाभारत कालके पश्चात् उत्तरी हिन्दु- इमान्तु नाभिजानेहममावास्यां त्रयोदशोम् ॥ खानमें पौर्णिमान्त महीनेकी रीति चल "मैंने चतुर्दशी, पञ्चदशी और षोडशी पड़ी और वह अब भी विक्रमी संवन्के । अर्थात् सोलहवीं तिथिको भी अमावास्या साथ साथ प्रचलित है। विक्रमी संवत् देखी है (अर्थात् एक दिनकी वृद्धि या पौर्णिमान्त महीनेका होता है-यह चाल क्षयको देखा है)। परन्तु मैं तेरहवें दिन कब निकली ? यह एक महत्त्वका प्रश्न है। अमावस्याको नहीं जानता।" इस वाक्य- परन्तु शक-वर्ष सदा अमान्त महीनोंका से सिद्ध है कि भारती-युद्ध के समय माना जाता है और सब ज्योतिष-प्रन्थों में तिथियोंके निश्चित किये जानेका गणित