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महाभारतमीमांसा

ग्यारहवाँ प्रकरण । ३६८

  • महाभारतमीमांसा

वाक्योंमें हुआ है; अर्थात् कृषि, और गौकी रक्षा करना और व्यापार ही उस समय मुख्य धन्धे थे। व्यापारमें ही 'कुसीद' यानी व्याज-बट्टेका धन्धा सम्मिलित है। व्यवहार और उद्योग-धन्धे । हम पहले बतला चुके हैं कि महाभारत- कालमें उद्योग-धन्धोंके सम्बन्धमें, खेतीके शाम इस प्रकरणमें इस बातका विचार सम्बन्धमें, गोरक्षाके सम्बन्धमें, यानी ९ करेंगे कि महाभारत-कालमें हिन्दु- समग्र वार्ता सम्बन्धमें, भिन्न भिन्न ग्रन्थ स्थानके व्यापार और उद्योग-धन्धोकी थे। पहले यह भी बतलाया जा चुका दशा कैसी थी । पहले इस बात पर ध्यान | है कि धर्मशास्त्रको दण्डनीति, अर्थ- देना चाहिए कि उस समय हिन्दुस्थानके शास्त्रको वार्ता और मोक्षशास्त्रको प्रान्ची- जो राज्य थे, उन सबको राज्य व्यवस्थाओं-क्षिकी कहते थे । दुर्भाग्यवश ये ग्रन्थ में व्यापार और उद्योगकी वृद्धिको ओर आजकल उपलब्ध नहीं हैं जिसके कारण सरकारकी पूरी दृष्टि थी । यह विषय एक हमें यह नहीं मालूम होता कि महाभारत- स्वतन्त्र राज्य-विभागके अधीन कर दिया कालमें उद्योग-धन्धों और खेती आदिके गया था। यह देखकर आश्चर्य होता है सम्बन्धमें कहाँतक बढ़ा-चढ़ा शान था कि इस विषय पर, इतने प्राचीन कालमें और इन कामों में सरकारसे किस तरह- भी, राज्य-प्रबन्ध-कर्ताओंका ध्यान था। की सहायता मिलती थी । तथापि उन सभा पर्वमें राज्य-व्यवस्थाके सम्बन्ध ग्रन्थोंसे अवतरण लेकर दण्डनीति अथवा नारदने युधिष्ठिरसे जो मार्मिक प्रश्न किये मोक्षशास्त्रके मत जैसे महाभारनमें कहीं हैं, उनमेंसे एक यह भी है कि- कहीं दिये गये हैं, वैसे ही महाभारतमें कश्चित्स्वनुष्टितातात वार्ता ते साधुभिर्जनैः। वार्ताके सम्बन्ध भी कहीं कहीं उल्लेख वार्तायां संश्रिते नूनं लोकोयं सुखमेधते ॥ पाया जाता है जिससे हम इस विषय ____"वार्ता में सब लोगोंके अच्छी तरहसे । पर थोडासा प्रकाश डाल सकते हैं। लग जाने पर लोगोंका सुख बढ़ता है: इससे हमें महाभारत-कालीन उद्योग- अतएव तेरे राज्यमें वार्ताकी ओर अच्छे धन्धोंकी परिस्थितिका कुछ अन्दाज हो लोगोंकी योजना तो है न ?” इस प्रश्नमें सकेगा। वार्ताके सम्बन्धमें गजाके कर्तव्यका महत्व पूरा पूरा दिखलाया गया है। खेती और बागीचे । सारांश यह है कि आजकलके उन्नत महाभारत-कालमें आजकलकी तरह राजाओंके कर्तव्योंकी कल्पनामें और पूर्व लोगोंका मुख्य धन्धा खेती ही था और कालकी कल्पनामें कुछ भी अन्तर नहीं है। आजकल इस धन्धेका जितना उत्कर्ष हो आजकल वार्ताका अर्थ, लोगोंकी वृत्तिका चुका है, कमसे कम उतना तो महाभारत- अर्थात उद्योग और जीविका-साधनका, कालमें भी हो चुका था । आजकल शाल है। इसमें वैश्योंके समस्त धन्धोका जितने प्रकारके अनाज उत्पन्न किये जाते समावेश होता था । महाभारत-कालमें ये हैं, वे सब उस समय भी उत्पन्न किये धन्धे मुख्यतः तीन थे; कृषि, वाणिज्य जाते थे। उपनिषदोंमें भी इन अनाजोंका और गोरक्षा । इनका उल्लेख भगवद्गीताके ! उल्लेख पाया जाता है। बृहदारगयमें