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महाभारतमीमांसा

३६६ ® महाभारतमीमांसा युद्धभूमिको छोड़कर गायब हुआ। प्रस्तु; महाभारत-कालमें आजकलकी फौजी महाभारतमें संकुलयुद्धके जो वर्णन हैं कवायद न थी । तथापि यहाँसे वहाँ वे कई अंशोंमें आजकलके युद्धों से समाचार अथवा प्राशा पहुँचानेके लिए मिलते हैं। | घुड़सवार दूत थे। अन्य बातें। दूतैःशीघ्राश्वसंयुक्तः समन्तात्पर्यवारयन्। (भी० अ० १२०-२६) सेनाके साथ साधारण लोगोंकी भी मावश्यकता रहती थी । उनका अचौहिणीकी संख्या। वर्णन उद्योगपर्वके अन्तमें इस तरह है। भारती युद्ध-कालमें अक्षौहिणीकी "सामानोंकी गाड़ियाँ, व्यपारियों और संख्या सचमुच कितनी थी, इसका बिल- वेश्याओंके वाहन, हाथी, घोड़े, स्त्रियाँ, कुल मेल नहीं जमता । प्रादि-पर्वके प्रार- पंगु आदि निरुपयोगी लोग, द्रव्यकोष म्भमें उपर्युक्त वर्णनमेंसे कोष्टक रूपसे और और धान्यकोष प्रादि सामानसे लदे हुए बैंकों में जो बात बतलाई गई है उससे हाथी अपने साथ लेकर युधिष्ठिरकी भिन्न बात उद्योग पर्वके १५५ वें अध्यायमें सवारी चली।” पूर्व कालमें क्या, और दी हुई है। अर्धाचीन कालमें क्या, सेनाके साथ सेना पंचशतं नागा रथास्तावन्त एव च। वेश्याएँ रहती ही हैं। केवल इतना ही दशसेना च पृतना पृतना दश वाहिनी ॥ अन्तर है कि वे अाजकलके कड़े नियमों- की अमलदारीमें नहीं रहती। इस तरहसे इस तरहसे कोष्टक देकर फिर तुर. भिन्न भिन्न अवयवों और युद्धोंके भेदोका त कहा गया है कि सेना, वाहिनी, वर्णन, महाभारतमें दिये हुए अनेक स्थलो- पृतना, ध्वजिनी, चमू , अक्षौहिणी, वरू- के वर्णनोंके आधार पर किया गया है। थिनी सब पर्यायवाची शब्द है । परन्तु प्राचीन कालकी तथा आजकलकी युद्ध। '! बात यहींतक नहीं रही । इसके आगे तुरन्त दुसरी गणना दी गई है। पद्धति और शस्त्रास्त्रोंमें बड़ा अन्तर हो गया है। इसलिए हमें प्राचीन युद्ध- नराणां पञ्चपञ्चाशदेषा पत्तिर्विधीयते। की कल्पना पूरे तौर पर नहीं हो सकती। इसमें, श्रादिपर्वकी तरह, कोष्टक- उदाहरणार्थ, युद्धोके वीरोंका परस्पर का प्रारंभ पत्तिसे किया गया है। परन्तु भाषण हमें असम्भव मालूम होता है। पत्तिका और ही अर्थ ५५ मनुष्य बत- आजकल एक दूसरेकी निन्दा करना और लाया गया है। आगे ३ पत्तिका सेना- अपनी शरताकी बड़ाई करना असम्भव मुख, ३ सेनामुखका गुल्म और ३गुल्मका है। परन्तु धर्म-युद्धकालमें वीरों के पास गण बतलाकर कहा है कि गण दस पास रहनेके कारण वह सम्भव था। हजारके होते हैं । यहाँ टीकाकार भी यह भी वर्णन है कि योद्धा लोग एक घबरा गया है । तात्पर्य, यही कहना दूसरेको अपने अपने नाम सुनाते थे। पड़ेगा कि अक्षौहिणी, चमू,भादि प्राचीन जिस तरहसे स्वयंवर भूमि पर राजानो-शब्द पाश्चात्य फौजोंकी तरह आर्मी, के माम सुने जाते थे, उसी तरह रण- डिवीजन, कोर सरीखे ही अनिश्चित थे। भूमि पर भी सुने जाते थे ( स्वयंवर- शल्यके सेनानायकत्वमें अर्थात् युद्धके इवाह ) यह भी माश्चर्य की बात नहीं। अठारहवे दिन कौरवोंके पास ३ करोड