पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/३६१

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
  • राजकीय परिस्थिति। *

३३५ - मागे होगा। भारतीय आर्य राजाओंकी मन्त्री या अमात्य नहीं बतलाया गया है। यह कल्पना कभी नहीं होती थी कि तथापि ऐसा सन्धि-निग्रह करनेवाला दूसरेको हरा देनेकी अपनी इच्छाको तृप्त अधिकारी अवश्य रहता होगा । गुप्तकालीन करनेके लिए अधार्मिक युद्धका आश्रय शिलालेखोंमें इन अमात्योका नाम महा- लिया जाय-उनकी स्पर्धा भारतीय सान्धि-विग्रहिक बतलाया गया है। यह सेनाकी उत्कृष्ट परिस्थितिके बारेमें ही आजकलका “फारेन मिनिस्टर" है । रहती थी। इस कारण भारतीय आर्य ऐसे अमात्योंका परराष्ट्रोंसे नित्य-सम्बन्ध लोग लड़ाई में अजेय हो गये थे। यूना- रहता ही था। ये महाभारतकालकी राज- नियोंने उनके युद्ध-सामर्थ्य की बड़ी प्रशंसा । व्यवस्थामें अवश्य रहे होंगे । युद्धकी की है। उन्होंने यह भी लिख रखा है कि अपेक्षा सामका मूल्य अधिक है। यह प्राचीन कालम हिन्दुस्थान पर सिकन्दरके बात सब उपायोमे सामको अग्रस्थान देने- पहले किसीने चढ़ाई नहीं की थी। से सिद्ध होती है। भारती युद्ध के समय चन्द्रगुप्त और अशोकके समयसे राजकीय श्रीकृष्ण युद्ध के पहले सन्धि करने के लिए और धार्मिक दोनों परिस्थितियाँ बदल गई भेजे गये थे। शत्रुको द्रव्य देकर उसके मन- जिससे भारतीय आर्योका युद्ध-सामर्थ्य को प्रसन्न करना दान है । इस तरह एक और स्थातन्त्र्य-प्रेम घट चला। अतएव किस्मका कर देकर गोको अपनी स्वत- हिन्दुस्थानके इतिहासको दिशा भी इसी न्त्रता रखनी चाहिए । दगड और लड़ाई- समयसे बदलती गई। के उपायोंका अलग वर्णन किया जायगा। यद्यपि शत्रुको जीतनेके लिए. दगड. प्राचीन कालमें भेदको बड़ा भारी और फ़ौज मुख्य उपाय थे, तथापि इस ' महत्त्व दिया गया था । राजनीतिमें प्रकट कामके लिए दूसरे उपाय भी उस समय गतिसे कहा गया है कि प्रत्येक राजा मालूम थे । महाभारतमें नीतिशास्त्रके जो : दूसरे गज्यमें द्रोह उत्पन्न करनेका प्रयत्न नियम कश्चित् अध्याय और शान्तिपर्व- । करे। यद्यपि यह बात आजकल प्रकट के राजधर्ममें दिये गये हैं, उनमें शत्रका गतिसे नहीं बतलाई जाती, तथापि पराजय करने के लिए साम दान. भेद प्रत्येक उन्नत राष्ट्र इस समय भी इस दण्ड, मन्त्र, औषध और इन्द्रजालके उपायका स्वीकार करता है। पहले बत- सात उपायोंका वर्णन किया गया है। लाया जा चुका है कि प्रत्येक राजा पर- कहा गया है कि शत्रुके बलाबल की परीक्षा गज्यमें गुप्तचर भेजे और वहाँके भिन्न भिन्न करके विजयेच्छु पुरुष उक्त उपायों से अधिकारियोंके आचरण पर दृष्टि रखे। किसी उपायकी योजना करे। इनमेंसे । मानना पड़ता है कि पूर्व कालमें परराज्य- मन्त्र दैवी उपाय है। हमें इसका विचार : के अधिकारियोंको द्रव्यका लालच देकर नहीं करना है । हम इन्द्रजालका भी वश कर लेनेका उपाय बहुधा सफल हो विचार नहीं करेंगे । सामका अर्थ सन्धि जाता था । यह बतला सकना कठिन है है। यह शत्रुसे सुलह करके आपसका कि गएकी स्वातन्त्र्य-प्रीतिका मेल इस वैमनस्य मिटानेका उपाय है। इस विरोधी गुण-दगाबाजीसे कैसे हो जाता सम्बन्धमें एक बात आश्चर्यकारक मालूम था । नथापि यह बात प्रकट रीतिसे होती है कि महाभारनमें लड़ाई अथवा जारी थी। इसका प्रमाण नारदके प्रश्नसे सन्धि करनेका अधिकारी कोई खास मिलना है । नारदने युधिष्ठिर से पूछा कि