पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/३५

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% 3D ॐ महाभारतके कर्ता श्लोकोकी जो संख्या गिनाई है उससे लोमपर्व और पौध्यपर्व सौतिके बनाये वर्तमान प्रचलित संस्करणोंमें १००० हुए हैं। हरिवंश खिलपर्व समझा जाता श्लोकोंकी कमी है और न्यूनाधिकताका है। 'खिल' का अर्थ है पोछेसे जोड़ा परिमाण भी बहुत थोड़ा है। इन सब । हुआ। इसकी पर्व-संख्या १० और १०० बातोसे कहना पड़ता है कि आज २००० से भिन्न है। इसे सौतिने प्रन्थके विषय- वर्ष बीत जाने पर भी (इस कालका ' की पूर्तिके लिये जोड़ा है. और इसी निश्चय आगे चलकर किया जायगा)सौतिके लिये उसको "खिलपर्व" नाम देकर ग्रन्थमें बहुत ही थोड़ा अन्तर पड़ा है। उन्नीसवाँ पर्व बनाया है। उसमें छोटे ____ सौतिने अपने ग्रन्थके अठारह पर्व छोटे तीन पर्व हैं । मालूम होता है कि इन बनाये हैं । यह पर्व-विभाग नया है और पर्वोका कर्ता सौति नहीं है । खैर, महा. उसीका किया हुआ है । वैशम्पायनने भारतमें यह स्पष्ट वचन है कि "पहले अपने 'भारत' में जो पर्व वनाये थे वे भिन्न व्यासजीने १०० पौंकी रचना की: तद- हैं, छोटे हैं और उनकी संख्या १०० है। नन्तर सून-पुत्र लोमहर्षणिने नैमिषारण्य में यह बात महाभारतमें सौतिकी दी हुई सिर्फ १८ पोंका ही पठन किया":-- अनुक्रमणिकासे ही प्रकट है। कोई ग्रन्थ- एतत्पशतं पूर्ण व्यासेनोक्तं महात्मना । कार, अपने एक ही ग्रन्थमें, एक ही नाम ययावत्सूतपुत्रंण लोमहर्षणिना ततः ॥ के छोटे और बड़े विभाग कभी नहीं ' उक्तानि नैमिषारगये पर्वाण्यष्टादशैव तु ॥ करेगा । वह अपने ग्रन्थके छोटे और बड़े (श्रा० अ०२-८४) विभागोंको भिन्न भिन्न नाम देगा, जैसे इससे निर्विवाद सिद्ध है कि १० काण्ड और उसके अन्तर्गत अध्याय । पर्वोके विभाग सौति-कृत है।। अथवा सर्ग । इससे स्पष्ट जान पड़ता है। वर्तमान महाभारतके रचयिता व्यास, कि उक्त दो प्रकारके विभाग भिन्न भिन्न वैशम्पायन और सौतितोनों व्यक्ति काल्प- ग्रन्थकारोंके किये हुए हैं। अर्थात् , वैशं- : निक नहीं है किन्तु सत्य और ऐतिहासिक पायनके भारत-ग्रन्थमें पर्व नामक विभाग ' हैं । कृष्ण यजुर्वेदकाठकमें पाराशर्य न्यास थे जो बहुत छोटे छोटे थे; सौतिने इन ऋषिका नाम पाया है। व्यास भारतो. छोटे पर्वोको एकत्र करके अपने बृहत् युद्ध के समकालीन थे । महाभारतके ग्रन्थके १८ पर्ष किये और इन विभागोंका अनेक वर्णन प्रत्यक्ष देखे हुए जान पड़ते नाम भी उसने पर्व ही रखा। इसका हैं और उनमें कई बातें ऐसी हैं जिनकी परिणाम यह हुआ है कि एक बड़े पर्वमें कल्पना पीछेसे कोई कवि नहीं कर सकता। उसी नामके छोटे उपपर्व भी शामिल हो कहा गया है कि वैशम्पायन व्यासजीके गये हैं। उदाहरणार्थ. सौप्तिकपर्वमें एक शिष्य थे। (सम्भव है कि वे प्रत्यक्ष सौतिकपर्व है, सभापर्वमें सभापर्व है शिष्य न होकर केवल शिष्य-परम्परामें और अश्वमेधिकपर्वमें अश्वमेधिकपर्व है। ही हो।) इनका नाम आश्वलायन गृह्य- यह अनुमान भी हो सकता है कि वैशम्पा- सूत्र में पाया जाता है। ये अर्जुनके पोते यनके मूल भारतमें ठीक ठीक १०० पर्व न जन्मेजयके समकालीन थे। समस्त महा- होंगे। कहीं कहीं सौतिने नये पर्वोकी भी भारतकी भाषा ऐसी है जो प्राचीन भाषा रचना की है। क्योंकि इसमें सन्देह नहीं और आधुनिक संस्कृत भाषासं मिला कि अनुक्रमणिकापर्व, पर्वसंग्रहपर्व, पो- है और जो प्रत्यक्ष बोलचालमें प्रानेवाली