पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/३४

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महाभारतमीमांसा
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जा सकता है कि व्यासजीके समान : म्भिक अध्यायोंमें,प्राधुनिक ग्रन्थ-रचनाकी प्रतिभा सम्पन्न संस्कृत कविके लिये प्रति- 'पद्धतिके ही अनुसार, सौतिने प्रस्तावना, दिन आठसे अधिक अनुष्टुप श्लोकोंकी उपोद्धात और अनुक्रमणिकाका समावेश रचना कर सकना बहुत सहज था । किया है और इस बातकी गिनती कर सारांश, यह बात निश्चित रूपसे नहीं दी है कि प्रत्येक पर्वमें कितने श्लोक बतलाई जा सकती कि व्यासजीके मूल और कितने अध्याय हैं। इससे सौतिके प्रन्थका विस्तार कितना था । वैशम्पायन ग्रन्थको प्रायः स्थायी स्वरूप प्राप्त हो गया के 'भारत' में श्लोकोंकी संख्या २४००० है। वर्तमान प्रचलित महाभारतमें श्लोको- होगी। महाभारत में ही स्पष्ट कहा गया की जो संख्या पाई जाती है वह सौतिकी है कि "भारत-संहिता २४००० श्लोकोकी बतलाई हुई संख्यासे लगभग १००० कम है,और शेष ७६००० श्लोकोंमें गत कालीन | है। कुछ पर्वो में श्लोकोंकी संख्या कम है लोगोंकी मनोरंजक कथाओंका वर्णन है।" और कुछ पर्यों में अधिक है। परन्तु इस इलले अनुमान होता है कि उपाख्यानोंको न्यूनाधिकताका परिमाण अत्यन्त अल्प छोड़कर शेष २४००० श्लोकोंमें भारत- है। भारतके टीकाकारने भी प्रत्येक पर्वक संहिताकी रचना की गई है । संहिता शब्द अन्त में इस न्यूनाधिकताका उल्लेख किया 'प्रथसे लेकर इति तक एक सूत्रसे लिखा है .। उसकी रायमें यह न्यूनाधिकता हुआ ग्रन्थ' इस अर्थका द्योतक है। यह लेखकोंकी भूलसे हुई होगी। परन्तु प्रश्न बात भी प्रसिद्ध है कि व्यासजीके पाँच यह है कि सौतिकी बतलाई हुई संख्यासे, शिष्योंने अपनी अपनी भारत-संहिताकी | वर्तमान प्रचलित संस्करणोंमें, जहाँ रचना भिन्न भिन्न की है। इससे भी श्लोकों की संख्या कुछ अधिक है वहाँ संहिता शब्दका वही अर्थ प्रकट होता है। लेखकोंकी भूल कैसे मानी जाय? अर्थात् जो ऊपर दिया गया है। तब. भारत- प्रकट है कि लेखकोंने जान बझकर पीछेसे संहिताका विस्तार २४००० श्लोक-संख्या- श्लोकोंकी संख्या बढ़ा दी है। ऐसे बढ़ाये का है इस वाक्यले यही प्रकट होता हुए श्लोक मुख्यतः वन पर्व और द्रोण पर्व- है कि वैशंपायन द्वारा रचे गये ग्रन्थों में ही पाये जाते हैं। आदि पर्वमें सौतिने २४००० श्लोक थे। सौतिके ग्रन्थके विषय- २२७ अध्याय बतलाये हैं और टीकाकार- में यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं कि का कथन है कि उसमें २३७ अध्याय हैं। उसका विस्तार कितना है। सब लोग इन सब अध्यायोंकी श्लोक-संख्या कम है, "जानते हैं कि वैशम्पायनके 'भारत में इसलिये माना जा सकता है कि अध्यायों- उपाख्यान श्रादि जोड़कर उसने एक लाख की अधिक संख्या लेखकोंकी भूलसे लिखी श्लोकोंका महाभारत बना डाला। गई होगी। परन्तु वन पर्व और द्रोण पर्वमें यह बात स्वाभाविक है कि बैशम्पायन- अध्याय भी अधिक हैं और श्लोक भी अधिक के प्रन्यके प्रारम्भमें आस्तिकको कथा हैं। यह बढ़ी हुई श्लोक-संख्या ज्यादा नहीं है; कही गई हो। अर्थात् इसमें सन्देह नहीं अर्थात् धन पर्वमें लगभग २०० श्लोक और कि उस कथाके पहिलेके अध्याय सिर्फ द्रोणपर्वमें लगभग ६०० श्लोक बढ़े हैं। इस सौतिके हैं: अर्थात् अनुक्रमणिका पर्व, प्रकार दोनों पोंको मिलाकर सिर्फ ८०० पर्वसंग्रह पर्व, पौष्य पर्व, पौलोम पर्व श्लोक, दोनों पाके कुल २१००० श्लोकोमें मिलाकर १२ अध्याय सौतिके हैं। इन प्रार- बढ़ गये हैं । समस्त महाभारतमें सौतिने