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महाभारतमीमांसा

& महाभारतमीमांसा - लिए तत्पर रहें, परन्तु अर्थको और मीठा भोजन करे, पर वह हानिकारक न दुर्लक्ष न करें । अर्थके लोभसे धर्मको न होने पावे, सन्मानियोंका मान रखे, त्यागें । अर्थात् धर्मकी प्रीति, अर्थके लोभ निष्कपट भावसे गुरुजनों की सेवा कर, और सुखकी अभिलाषाको मर्यादित दम्भको छोड़ देवताओंका पूजन करें. रखें। धर्म, अर्थ और काम तीनों मर्यादा- सम्पत्तिको इच्छा करे, पर इष्ट सम्पत्ति के बाहर न जाने पावं, अतएव तीनोंके निन्दनीय न हो, सम्पत्तिका उपभोग करे, लिए विशिष्ट समय निश्चित कर देना पर उस पर प्रेम न रखे, सावधान रहे. चाहिए। पर्वाहमें धर्मकृत्य करना चाहिए, किन्तु कालज्ञान-शून्य न हो, अश्वासन मध्याह्नसे सायंकालतक द्रव्यार्जनके काम दे, पर शत्रुको छोड़ देनका आश्वासन न करना चाहिए, और रात्रिमै सुखोपभोग द, शत्रु और उसके अपराधको बिना जाने करना चाहिए । राजा इन चौदह दोषोंसे उस पर हथियार न चलावे,शत्रुको मारने दर रहे:-"नास्तिकता, असत्य, क्रोध, पर उसके लिये शोक नहीं करना चाहिए, प्रमाद, विलम्ब करना, ज्ञानी लोगोंसे न बिना कारणके कोप न करे, अपराधी मिलना, आलस्य, इन्द्रियशक्ति, धनलाभ, नथा अपकारी पर दया न करे ।" दुष्टजनोंकी सलाह, निश्चित कार्य के लिए ये सब नियम महत्वपूर्ण हैं । ऐसा उदासीनता, रहस्यको खोल देना, दव- व्यवहार करनेवाला गजा सचमुच ताप्रोके उत्सव न करना और शत्रुको मजाकं लिए सुखदायक ही होगा। इनके कब्जे में न रखना ।" शान्ति पर्वमें राजाके सिवा और कुछ नियम हैं: जैस-राजा व्यवहारके ३६ नियम बतलाये गये हैं। वे प्रातःकाल रात्रिमें किये हुए मन्त्रों पर भी अति उदात्त तथा उपयुक्त हैं। राजा विचार करे और प्रजाके कल्याणकारी राग-द्वेषको छोड़कर धर्माचरण करे, उपायोंको सोच । वह स्वयं अकेला कोई स्नेहका त्याग करे, नास्तिकताका स्वीकार मन्त्र न करे, किसी दसरके साथ विचार न करे, कार्यका अवलम्ब न कर द्रव्य प्राप्त कर, पर तीसरंके साथ नहीं । योग्य करे, ऐश्वर्यको स्वीकार न कर विषयोप- विचार करने पर जो निश्चय हो जाय भोग करे, दीनता न दिखावे, प्रिय भाषण उसके अनुसार शीघ्र ही कार्रवाई की करे,शर रहे परन्तु आत्मस्तुति न करे, दान-जाय । वह मूर्ख लोगोंको अपने पास न शूर रहे, पर कुपात्रको दान न दे। राजा- रखे,किन्तु हजार मूखोंके बदले एक चतुर प्रगल्भता होनी चाहिए, पर निष्टरता आदमीरखे। विद्वानोको सदा पारितोषिक नहीं। वह नीच लोगोंकी सङ्गति न करे, । देकर सन्तुष्ट रखे। वह अपने नातेदारों भाई-बन्दोसे बैर न करे, ऐसे मनुष्यको और वुजुर्गाको मदद दे । समय पर दतका काम न दे जिसकी उस पर भक्ति व्यापारियों और कारीगरोंकी सहायता न हो. अपना हत न बतलावे, अपने कर और जो नौकर दरिदावस्था में हो गुणोंको श्राप ही न बतावं, सज्जनांसे उन्हें ठीक समय पर सहायता दे। जो कुछ न ले, पूरा पूरा विचार किये बिना अधिकारी अपना काम ठीक ठीक करते दण्ड न दे, गुप्त कार्रवाई प्रकट न करे, हो, उन्हें बिना अपराधके अलग न करे। अपकार करनेवाले पर विश्वास न रखे, मुख्यतः राजा ईश्वरका भय मानकर बिना ईर्ष्याके त्रियोंकी रक्षा करे, स्त्री- सत्यको कभी न छोड़े । सारी राज- सेवन अतिशय न कर, सदा शुचि रहे, सत्ताका आधारस्तम्भ सत्य है। राजा