पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/३२५

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® राजकीय परिस्थिति । विशेषतः पहाड़ी मुल्कके लोग एक ही वंश- के कुरु-पाञ्चाल आदि लोगोंके राजामौके के, मुख्यतः आर्य जातिके थे । इसलिए लिए, महाभारतमें भी केवल 'राजा' पद- उनकी व्यवस्था निराली थी, यानी वह ' का उपयोग किया गया है। मत्स्य देशके प्रमुख लोगोंके हाथमें स्वतंत्र प्रकारकी विराटक नाममें इस विचार-श्रेणीसे कुछ थी। इसके विरुद्ध, पूर्वकी और मगध विशेष अर्थ प्रतीत होता है। अस्तु: ऊपर- प्रादि देशोके राज्य बड़े थे। वहाँकी प्रजा के अवतरणसे, और महाभारतसे भी, यही विशेषतः शुद्र वर्णकी या मिश्र वर्णकी दृढ़ अनुमान निकलता है कि सम्राट्की अधिक थी, इसलिए वहाँकी राज-व्यव- कल्पना पूर्वको आरके मिश्र लोगोंके स्था दूसरे ही ढंगकी थी, अर्थात् वह राज-बड़े विस्तीर्ण राज्योंके आधार पर उत्पन्न सत्ताक थी। यह बात ऐतरेय ब्राह्मणके हुई होगी। नाच दिये हुए अवतरगणस मालुम हा जायगी । रमेशचन्द्र दत्तन इस अवतरण- : प्राचीन साम्राज्य-कल्पना। को अपनी पुस्तकों में लिया है । इसका सम्राटकी कल्पनाकी उत्पत्तिके भावार्थ यह है:--"पूर्व गजाकी 'सम्राट' विषयमें एक चमत्कारिक सिद्धांत महा. पदवी है, दक्षिणके राजाको 'भोज' कहते । भारतके सभापर्वमें बतलाया गया है। हैं, पश्चिमी लोगोंमें विगद नाम है, और जब युधिष्ठिर गजसूय यज्ञका विचार मध्यदेशमै राजाको कंवल 'राजा' ही कहते करने लगे, तब उन्होंने श्रीकृष्णकी राय हैं।" इसमें प्रकट होता है कि पूर्वी लोगों- ली। उस समय श्रीकृष्णने जी उसर में सम्राट अथवा बादशाह संज्ञा उत्पन्न : दिया वह यहाँ उद्धृत करने योग्य है। हो गई थी। वहाँके राजाओंके अधिकार श्रीकृष्णन कहा-“पहले जब परशुरामने पूरी तरहसे बदल गये थे और साधारण : क्षत्रियोंका संहार किया था, उस समय लोगोंके अधिकार प्रायः नए हो गये होंगे। जो क्षत्रिय भागकर छिप रहे थे, उन्हींकी अधिक क्या कह, एकतंत्र राज्य-पद्धति ! यह सन्तान है, इसी लिए उनमें उग्र शात्र- प्रथम पूर्वी देशोंमें ही जारी हुई होगी। तेज नहीं है । उन हीनवीर्य क्षत्रियोंने म्लेच्छ अथवा मिश्र आर्य इसी दशमं । यह निश्चय किया है कि जो गजा सब अधिक थे । इतिहाससे मालूम होता है क्षत्रियोंको जोतंगा उसीको अन्य गजा कि पूर्वकी ओर मगधका राज्य बलवान भी सार्वभौम मानंग । यह तरीका अब- हो गया और आगे वही हिन्दुस्तानका तक चला आता है। इस समय राजा जरा- सार्वभौम राज्य हो गया। यह भी निर्वि- · संघ सबसे बलवान है । पृथ्वीके सभी वाद है कि पूर्वी गजाओंकी सम्राट पदवी गजा चाह व एल राजा हो अथवा एच्वाक थी। उपनिषदोंमें भी देख पड़ता है कि गजा हो, उसका कर देते हैं और अपने- जनकको वही पदवी दी गई थी। अथो को जरासन्धके अङ्कित कहते है । एल मगधके सिवा विदेहके राजाओंकी भी और पंन्याक राजाओं के सौ कुल हैं। यही संशा थी। महाभारतसं भी प्रकट होता उनम भोज-कुलके गजा इस समय बलिष्ठ है कि दक्षिणके राजानाका भोज कहन है.और उनमसे जगसन्ध गजान सबको थे । दक्षिणके बलवान् राजा भीष्मक और ' पादाक्रान्त किया है। सागंश, सब क्षत्रियों रुक्मीको यही 'भाज' संज्ञा दी गई है। न जगसन्धका आधिपत्य मान लिया है इसी प्रकार देस्त्र पड़ता है कि मध्यप्रदेश- और उस सार्वभौम पद पर बैठा दिया