पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/३२१

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  • राजकीय परिस्थिति ।

२६५ - हैं। ये सब लोग एक-वंशी, एक-धर्मी कि युधिष्टिरने पाँच ही गाँव माँगे थे। और एक ही भाषा-भाषी थे। सारांश उस समय क्षत्रियोंकी महत्वाकांक्षा यह है कि प्रीस देशके लोगों के समान ही इतनी ही थी और इस समय भी राज- इनकी परिस्थिति थी और इन भिन्न भिन्न पूनोंकी महत्वाकांक्षा वैसी ही है । नीचे राज्योंके लोगोंका आपसमें विवाह-सम्बन्ध दिये हुए श्लोकमें उपर्युक्त चित्र उत्तम होता था । राजकीय-सम्बन्धमें ये सब गतिसे प्रतिबिम्बित देख पड़ेगा। स्वतन्त्र थे और ग्रीक लोगोंके समान ही गृहे गृहे हि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रियं- इनके आपसमें निन्य संग्राम हश्रा करते कराः । नच साम्राज्यमाप्तास्ते सम्राट थे। परन्तु यहाँ ध्यान देने योग्य एक शब्दोहि कृच्छ्रभाक ॥ बात यह है कि इन्होंने एक दूसरेको (सभ० प०अ०१५) मष्ट करनेका कभी प्रयत्न नहीं किया । “घर घर गजा है, परन्तु उनकी एक जाति दुसरी जातिको जीत लेती सम्राट' पदधी नहीं है।" इस वाक्यसे थी, परन्तु पराजित लोगोंकी स्वतन्त्रता- अनुमान हो सकता है कि हर एक शहरमें का नाश कभी नहीं किया जाता था। राजा रहता था । कोई राजा विशेष बल- ऐसी परिस्थिति भारती कालसे जारी बान होकर सम्राट् भले ही हो जाय, थी। पहले पार्योने अर्थात सूर्यवंशी पर वह इन गजाओंका नाश नहीं क्षत्रियोंने पावसे लेकर हिमालयके करता था। पगजित गजा अपने प्रभुको किनारे कोसल-विदेहतक गज्य स्थापित कुछ कर और नजराना दे दिया करने किये । दुसरे चन्द्रवंशी आर्य गङ्गाकी थे। बम, यही काफ़ी समझा जाता था। घाटियों से होते हुए प्राय : पर उन्होंने शान्ति पर्वमें स्पष्ट कहा है कि जित राजा पहले आये हप लोगोंके स्वानन्य-नाश- कभी पदच्यूत न किया जाय । यदि वह का प्रयत्न नहीं किया। उन्होंने दक्षिण- । ज़िन्दा हो तो फिर वही गद्दी पर बैठाया को और गङ्गा और जमनाके किनारे जाय । यदि वह मर जाय तो उसके नथा मध्य हिन्दुस्थानमें मालवे और लड़केको या किसी नातेदारको गद्दी पर गुजराततक सैकड़ो गज्य स्थापित किये। बैठाना चाहिए* | युधिष्ठिर और दुर्यो- ये राज्य मिकन्दरके समयतक ऐसे ही छोटे छोटे थे। पक्षाव और सिन्ध में जिन । भारत-काल मे पराजित राष्ट्रीका रवन त्रता नष्ट न करनेकी भोर बहुत ज्यान दिया जाना था। यह बात भिन्न भिन्न लोगोंको सिकन्दग्ने जीता युधिष्ठिरको न्याम द्वारा किये हुए उपदेशमे व्यक्त हो था. उनकी संख्या ५० के लगभग होगी। नानी है.-"जिन भूपतियोंके गए और नगरमें जाकर यदि पञ्जाब और सिन्धु यही दो राज्य उनके बन्धु, पुत्र या पौत्रोंको उनके गन्यमें अभिषिक्त कगे, हों, तो भी आधुनिक हिसाबसे वे छोटे फिर वे चाहे बाल्यावस्थामें हो या गर्भावस्थामें। जिनके समझे जायेंगे। कहनेका तात्पर्य यह है कोई पुत्र न हो उनकी कन्या भोको अभिषिक्त कगे। ऐसा कि उस समयके गज्य छोटे छोटे हा करनेम, बभवकी इच्छाके कारण, स्त्रियाँ शोकका त्याग करते थे। हर एक राज्यका विस्तार के करगी।मसे यह देख पटता है कि महाभारत कालमें, पुरुप वारिम अभावमे, कन्या भी गद्दी पर बैठाई जाती इतना ही रहा करता था कि उसकी थी। यह नोक देखिये-- मुख्य मध्यवर्ती एक राजधानी रहती थी कमारो नाम्नि येषांच कन्याम्नत्राभिषेचय । और उसके चारों ओर कुछ प्रदेश रहता कामाशयो हि श्रीवी शोकमेव प्रहारयति ॥ था। अर्थात् इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं । (शां० श्र. ३३-४६)