पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/३१३

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सामाजिक परिस्थिति-रीनि-रवाज । * २८७ जाती थी। अठारह दिनका युद्ध बनाते । उनके मतसे मृत व्यक्तियोंके समात हो जाने पर युधिष्ठिर तथा अन्य सद्गुणोको चर्चा ही उनका बढ़िया स्मारक लोगोंने गङ्गा पर जाकर जो तिलाञ्जलि है। और मृत व्यक्तियोंकी स्मृति ऐसे दी, इसका अचरज होता है । रणाङ्गण- सद्गुणोंकी स्थितिसे ही स्थिर रहती है।" में मरे हुए प्रसिद्ध प्रसिद्ध योद्धाओंकी | यही कारण होगा जिससे प्राचीन कालकी लोथें खोजी जाकर जलाई गई, ऐसा स्मारककी इमारतें हिन्दुस्थान में नहीं पाई मागे वर्णन है। यह भी आश्चर्यकी बात है। जातीं। मिसर देशमें बड़े बड़े पराक्रमी मालूम नहीं होता कि द्रोण, कर्ण श्रादिकी राजाओके-फिर चाहे वे सद्गणी हो या लोथें कई दिनोंके बाद भी साबूत मिल दुगुणी-स्मरणार्थ बनाये हुण पिरामिड गई होगी । खैर, यह आश्चर्यकी बात अबतक मौजूद हैं । किन्तु हिन्दुस्थानमें नहीं कि महाभारतके समय भी युद्ध में यह कल्पना ही न थी, इससे ऐसे मन्दिर मारे हुए वीरोंको क्रिया हिंस्र पशु-पक्षियों- नहीं बनाये गये । हुपनमांगने वर्णन के द्वारा लोथोंको खिला देना ही था। किया गया है कि-"मृत व्यक्तिके अन्त्य- क्योंकि यूनानी लोगोंने पञ्जाबके तक्षशिला | संस्कारके समय उसके रिश्तेदार जोर शहरके आसपासकी इस गतिका वर्णन | ज़ोरसे रोते हैं, छाती पीटते हैं और अपने किया है कि वहाँ लोथे जालमें रख दी बाल नोचते है ।" इस रीतिका अपशिष्टांश जानी थी, जहाँ उन्हें गिद्ध खा जाते थे। कुछ जातियोंमें विशेषतः गुजरातियों में इससे ऊपरवाली वोगेकी लोथोंकी देखा जाता है। मालूम होता है कि महा- व्यवस्था ठीक जान पड़ती है। और यह भारतके समय भी इस प्रकारकी रीति बात भी देख पड़ती है कि पञ्जाबके कुछ रही होगी । "अशोच्यो हि हतः शूरः" लोगोंमें ईगनियोंकी चाल अबतक मौजूद श्लोकमे जान पड़ता है कि शरके सिवा थी। सिन्धु नदीके पारके श्रार्य और इस अन्य मृतकों के सम्बन्धम शोक करनेकी पारके आर्य पहले किसी समय एक ही रीति महाभारतके समय भी रही होगी। थे। पञ्जाबके पार्यो में सुधार नहीं हुए, और गङ्गा, यमुना तथा सरस्वती-तीर पर वाहन। पार्योकी सभ्यता बहुत आगे चली गई। मुख्य मुख्य गीतियोंके विषयमें अब- यह पहले देखा ही जा चुका है। इन नक उल्लख हो चुका । अब कुछ और बाती लोगोंमें मुर्दोको जलानेकी ति पूर्णतया पर भी ध्यान देना है। धनवान लोगोंका प्रचलित थी। इससे, और कुछ और सबसे अधिक प्रिय वाहन हाथी था। पिछड़ी हुई रीतियोंके कारण, भारती बाणने वर्णन किया है कि राजा लोग प्रार्य पजाबी लोगोंकी निन्दा कर उन्हें । विशेषतः हथिनी पर सवार होते थे। धर्म-बाह्य मानते थे। कुछ विशेष व्यक्ति युनानी इतिहासकार अगयन लिखता जल-समाधि लिया करते थे, इसका है-"माधारण जन समाजमें ऊँट, घोड़े उन्लेख अन्यत्र होगा। और गदहे सवारीके काम आते हैं। परन्तु __यूनानियोंने हिन्दुस्थानियोंके मृतकोंके धनवान लोग हाथी रखते हैं : क्योंकि सम्बन्धमें और भी कुछ रीतियोंका उल्लेख हाथी राजाओंका वाहन है। हाथीके बाद, किया है। "हिन्दुस्थानी लोग मृतकोंके बई लोगोंमें, चार घोड़ोंमे संयुक्त ग्थका उद्देशसे किसी प्रकार के स्मारक नहीं मान है। ऊँटका दर्जा तीसरे नम्बर पर