पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/२९३

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® सामाजिक परिस्थिति-वस्त्र । अँगरेज़-रमणियोंका है। हाँ, स्त्रियोंके इस लक्षणसे यह नहीं माना जा सकता केश खुले हुए इधर उधर न पड़े रहते थे। कि प्राचीन कालमें विधवाओंका सिर वे या तो साडीके छोर या उत्तरीयके मुँडा दिया जाता था। यहाँ पर तो सिर्फ भीतर रहते थे। पारसी ललनाप्रोकी सीमन्तका उद्धरण विवक्षित है। सिर तरह मस्तकके बाल सदा कपड़ेसे बँधे मुंडानेका अर्थ यहाँ विवक्षित माननेके न रहते थे। तथापि समस्त लोगोंकी लिए स्थान नहीं है। धृतराष्ट्रकी विधवा तरह यह नियम भारती श्रार्यों में भी था बहुओका जो वर्णन है उसमें उनके केश कि स्त्रियोंके सिरके खुले बालों पर समाज- मौजूद हैं। इससे, कमसे कम क्षत्रिय में सबकी नज़र न पड़े: इस कारण विधवाओके तो सिर न मुंडाये जाते मस्तकको वस्त्रके छोर या उत्तरीयसे थे। ऐसा अनुमान होता है कि सिर ढंकनेकीरीतिभारती पार्योंमें थी। स्त्रियों- मुंडानेकी चाल, संन्यासिनियोंके अनु- के केशोंकी रचनाका नाम सीमन्त था। करणसे-उनके लाल कपड़ेकी तरह- सीमन्त यानी केशोकी मांग। सोभाग्य- पडी होगी। अस्तु, विधवाओका सीमान्त वती स्त्रियाँ ही माँग निकालती थीं: न था-अर्थात उनके केश. बिना विधवा स्त्रियाँ ऐसा न करती थीं । कसी किये, वैसे ही बाँध लेनेकी रीति अनेक स्थानों पर इस तरहका वर्णन है। रही होगी। महाभारतके समय सौभाग्य- आश्रमवासी पर्वमें दुर्योधनकी विधवा वती स्त्रियोंके बालोंको भली भाँति कली- स्त्रियोंका जो "एतास्तु सीमान्तशिरो- से झाड़कर, बीचमें माँगक ज़रिए दो रुहा याः" वर्णन है उस टीकाकारने भाग करके, जड़ा बाँधनेकी रीति थी। भी ग़लत कहा है: और यह कहा है कि वेणी या तो एक होती थी या तीन । रामा- इसके बदले 'पतास्त्वसीमन्तशिरोरुहा यणमें सीताका वर्णन एक-वेणीधरा किया याः' पाठ होना चाहिए। महाभारतके गया है । अर्थात जिसका पति दूर हो समय विधवाओको माँग काढ़नका अधि- उसके केशीकी इस ढङ्गकी एक वेणीका कार न था । कई लड़ाइयोंके समयका यह वर्णन किया जाता था। और और स्त्रियों- वर्णन मिलता है। | की तीन वेणियाँ होती जो कि पीठ पर संहार सर्वतो जाते पृथिव्यां शोकसम्भवे। पड़ी रहती होगी । मारवाड़ियों में यह वह्वीनामुत्तमस्त्रीणां सीमन्तोद्धरण तथा ॥ चाल श्रवतक देख पड़ती है। जान पड़ता (शल्य पर्व २१) है कि गरीब मज़दूर स्त्रियों में वेणी बाँधने- ___“जहाँ पर भयङ्कर संहार हुश्रा वहीं की रीति प्राचीन समयमें न होगी । अनेक उत्तम स्त्रियोंका सीमन्तोद्धरण हा द्रोपदीन जिस समय सैरन्ध्रीका वेष गया ।" इस वर्णनसे विधवाओंका मुख्य धारण किया, उस समय केशोको सिर्फ लक्षण सीमन्त या माँगका न होना देख इकट्ठा करकं एक ओर गाँठ लगाकर पड़ता है। पानीपतकी लड़ाईके वर्णनमें दाहिने और उसके छिपा लेनका वर्णन है। लिखा है कि एक लाख चूड़ियाँ फूट गई, नतः केशान्समुत्क्षिप्य वेलिताग्राननि- अर्थात् आजकल विधवा होनेका मुख्य न्दितान् । कृष्णान्सूक्ष्मान्मृदुन्दीर्घान्समु- लक्षण चूड़ी फोड़ना समझा जाता है। इथ्य शुचिस्मिता ॥ जुगृहं दक्षिण पार्श्व इसी तरह महाभारतकं समय विधवाश्रांकी मृदुमितलांचना ॥ (विगट पर्व अ०६) मुख्य पहचान थी-सीमन्नका न होना। इसमें जो 'जुगह शब्द है उससे सन्दह