पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/२७७

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
  • समाजिक परिस्थिति-मन्न । *

और यक्षका हवि यानी दूध, घी और हिंसा सनातनीय धर्म-समाजमें पयो निन्द्र कराडे मौनोंमें हैं। इसी कारण ब्राह्मण और मानी जाय ? इसका कारण न बतलाया गौ दोनों ही एकसे पवित्र और अवध्य हैं। जा सकेगा। विशेषतः क्षत्रियोंने तो और इससे ऐतिहासिक अनुमान यह होता है | किसी हिंसाको निन्द्य नहीं माना, सिर्फ कि गौ यज्ञका साधन होनेके कारण गौकी हिंसाको ही घोर पातक मान उसका यज्ञ वयं है । पहले यह व्यवस्था । लिया है। वे भेड़, बकरे और बराहमादि- नहुषने की । किन्तु उस समय वह मान्य का मांस तब भी खाते थे और इस समय न हो सकी थी। हमारा मत है कि, यह भी खाते हैं। और अबतक जो यह होते व्यवस्था आगे चलकर श्रीकृष्णकी भक्तिसे हैं उनमें मेष आदिका ही हवन होता है। मान्य हो गई । श्रीकृष्ण यादव कुलके थे, इन कारणोसे, इस चलनका, बौद्ध या और यादव लोग गोपालक थे, गौओंसे जैन मतके प्रचारका परिणाम नहीं माना ही उनकी जीविका होती थी : यानी जा सकता। गाय, बैल सब तरहसे सना गोपालन उनका पेशा था । श्रीकृष्णका, तन धर्मके लिये पूज्य हो गये थे । गायका बालपनमें, गोचारण प्रसिद्ध है: उन्हें दृध लोगोंका पोषण करता था। उन्हींक गोएँ बहुत प्रिय थीं। जब श्रीकृष्णका मत द्वारा अन्न मंगाया और भेजा जा सकता प्रचलित हो गया और हिन्दुस्थानमें था और उनके सम्बन्धमे पहलेसे ही पूज्य श्रीकृष्णकी भक्ति बढ़ गई उस समय भाव था, तथा श्रीकृष्णकी भक्तिके कारण गौत्रोकेसम्बन्ध अत्यन्त पूज्य भाव उत्पन्न उन्हें और भी अधिक महत्त्व प्राप्त हो होकर हिन्दुस्थानमें सर्वत्र गवालम्भ बन्द गया। गौओंकी पवित्रताके विषयमें,महा- हो गया। यह बात भी ध्यान देने योग्य भारतमै अनेक स्थलों पर वर्णन है । प्रात:- है कि ईरानियोंने भी गौको पवित्र माना काल गायका दर्शन करना एक पुण्य माना है। तब, गौओंकी पवित्रता-सम्बन्धी जाता था। इन सब कारणोस, निर्विवाद- कल्पना हिन्दुस्थानमें भारती श्राोंके साथ, रूपेण कह सकते है कि महाभारत-कालके प्रारम्भसे ही, आई होगी । उक्त पाख्यान- पूर्वसे ही गाय-बैलांकी हिंसा बन्द हो में पहले नहुषके झगड़नेका वर्णन है । गई थी। इससे चन्द्रवंशी क्षत्रियों में इस निषेधका .. उद्गम देख पड़ता है । इसी वंशमें श्रीकृष्ण । पाश । यज्ञिय और मृगयाकी हिंसा । और यादवोंका जन्म हुआ और इसमें सन्देह नहीं कि अन्य पशुओं के श्रीकृष्णको भक्तिसं समूचे भारतीय आर्य- यज्ञ पहलेकी तरह होते थे और उनका समूहमें गवालम्भकी प्रवृत्ति बिलकुल मांस ब्राह्मण-क्षत्रिय खाते थे । वनवासमें बन्द हो गई। यह नहीं माना जा सकता पाण्डवोंकी गजर बहत कछ शिकारके कि जैन अथवा बौद्ध धर्मके उपदेशके ऊपर ही निर्भर थी। महाभारतमें कथा है परिणामसे यह निषेध उत्पन्न हुआ । , कि जब पाण्डव द्वैतवनमें थे, तब अनेक क्योंकि एक तो बौद्ध और जैन धर्मके मृगोंका संहार हो जानेसे मृग बहुत ही उदयके पहलेसे ही यह निषेध मौजूद व्याकुल हो गये। तब, मृगौने स्वप्नमें युधि- देख पड़ता है और दूसरी बात यह है कि ष्ठिरको अपना दुखड़ा सुनाया। इस पर ये धर्म तो सभी प्राणियोंकी हिंसाको युधिष्ठिरने छैनवन छोड़नेका निश्चय किया। निम्ध मानते हैं। फिर सिर्फ गाय-बैलोकी । दूसरे दिन पागडवी और ब्राह्मणों समेत