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महाभारतमीमांसा
  • महामारतमीमांसा

आठका प्रकरण। अङ्गीकार कर लिया। मैक्समूलरने एक स्थान पर यही बात कही है। प्रस्तु: मित्र भिन्न कारणोंसे भारती-कालमें भारती आर्योका भोजन बदल गया । इस भागमें सामाजिक परिस्थिति। हमने इसी बातको विस्तारपूर्वक दिख- लानेका विचार किया है। (१) अन्न । . प्राचीन वैदिक ऋषि लोग यशके पक्के मारनी-कालके प्रारम्भमें अर्थात भारती पुरस्कतो थे, यह बात प्रसिद्ध है। वैदिक क्षत्रिय लोग भी यक्षकी अनेक विधियाँ युद्ध के समय, और भारती-काल- किया करते थे। ये सभी वैदिक वन के अन्तम यानी महाभारतके समय, हिंसायुक्त होते थे। इन यज्ञोंमें तरह तरह के भारती पार्योंकी परिस्थितिमें, भिन्न भिन्न पशु मारे जाते थे और उनका हवन होता बातोंमें बहुत कुछ अन्तर देख पड़ता है: | था। अर्थात् साधारण रीतिसे प्राचीन जैसा कि उनकी विवाह-पद्धतिमें या वर्ण- व्यवस्थामें भी अन्तर पड़ गया । इन खाते वैसे ही भारती आर्य भी मांसान समयमें, जैसे कि सभी देशोवाले मांसास यातोका यहाँतक विचार किया गया है। भोजन के सम्बन्धमें, इन समयों में उनकी भक्षण करते थे। इसमें कुछ आश्चर्य परिस्थितिमें इससे भी बढ़कर फ़र्क पड़ नहीं; और- गया था। अर्थात भारती-कालमें (ई० स यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः। पू० ३००० से ३०० तक) आर्यों में इस | इस न्यायसे वैदिक-कालीन ब्राह्मण सम्बन्धमे बहुत बड़ा फर्क पड़ा। यह और क्षत्रिय लोग यज्ञमें पशुओंको मार- फर्क उपनिषदोंसे लेकर महाभारत-मनु- कर, भिन्न भिन्न देवताओंको, उनके मांस- स्मृतितक भिन्न भिन्न ग्रन्थोंमें पूर्णतया का हविर्भाग अर्पण किया करते थे और देख पढ़ता है। यह फ़र्क, एक दृष्टिसे, खुद भी मांसहवि खाते थे। इन यज्ञोंका प्रायौंकी उन्नतिके लिये कारणीभूत हो दर्जा गवालम्भ और अश्वमेधतक पहुँच गया तो दूसरी तरहसे उनकी अवनतिके गया था: और तो और, अश्वमेधसे ज़रा लिये इसीको कारण भी मानना पड़ता और आगे पुरुषमेध पर्यन्त यज्ञकी है। यदि आध्यात्मिक अथवा नीतिकी श्रेणी पहुंच गई थी। फिर भी समस्त दृष्टिस देखें तो जिन लोगोंने केवल यज्ञोंमें अश्वमेध श्रेष्ठ माना जाता था। धार्मिक विचारस और निरी आध्यात्मिक अश्वमेध करनेमें एक तरहका राजकीय उन्नतिके निमित्त मांस-भोजन त्याग दिया, ऐश्चर्य व्यक्त होता था, इस कारण साम- उनकी दयावृत्ति और आध्यात्मिक र्थ्यवान् क्षत्रिय लोग अश्वमेध किया कल्याण कर लेनेकी आकांक्षाकी जितनी करते थे। इसी प्रकार सार्वभौम राजा प्रशंसा की जाय, थोड़ी है । परन्तु व्याव- राजसूय यज्ञ करते थे। महाभारतमें वर्णित हारिक अथवा राजकीय दृष्टिसे देखते है कि पाण्डवोंने ये दोनों यश किये थे। हुए कहा जा सकता है कि अपनी राज- पाण्डवोंने जो अश्वमेध किया उसका कीय स्वाधीनताका भी त्याग मान्य करके वर्णन महाभारतमें है। उसमें सैकड़ों भारतवर्षबालोन शाक-पातका भोजन ! प्रालियोंके मारनेका वर्णन है।