पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/२६९

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  • विवाह-संहा18:

- मान नहीं होता । अर्थात् सतीकी प्रथा महाभारतके समय पर्देकी प्रथा प्रत्यक्ष बहुत पुरातन होगी । यूनानी इतिहास- . वर्तमान थी : क्योंकि यूनानी इतिहास- कारोंके प्रमाणसे महाभारतके समय कारोने भी इसका वर्णन किया है। मेगा. उसका प्रचलित होना निस्सन्देह है । स्थिनीज़ने इसका उल्लेख किया है। कथा- हिन्दुस्थानमें सतीकी प्रथा अङ्गरेज़ी राज्य- सरित्सागरमें भी नन्दोके अन्तःपुरका जो के प्रारम्भतक थी, किन्तु अब वह सर- वर्णन है, उससे भी प्रकट होता है कि कारी कायदेसे निषिद्ध हो गई है। राजाओंकी स्त्रियाँ पर्दे में इस तरह रखी जाती थीं कि उनके नाखूनतक देवता भी पर्देका रवाज। न देख सकें। कथासरित्सागरमें वर्णित इसी सिलसिलेमें अक्सर यह प्रश्न है कि एक राहगीग्ने अन्तःपुरकी ओर किया जाता है कि महाभारतके समय नज़र उठाकर देखा था, इसलिए उसे हिन्दुस्तानमें पर्देकी गीति थी या नहीं। पाटलिपुत्र प्राण-दण्ड दिया गया । महाभारतके कई एक वर्णनोंसे यह अनु- सारांश, महाभारतसे समय अर्थात् सम् मान होता है कि क्षत्रिय गजात्रोमें महा-ईसवीसे पूर्व ३०० वर्षके लगभगराजाओं- भारतके समय पर्दा रहा होगा । शल्य- में पर्देकी यह गति पूर्णतया प्रचलिन थी। पर्व, युद्धका अन्त होने पर, दुर्योधनकी इस कारण सौतिने महाभारतमें उल्लिखित त्रियाँ जब हस्तिनापुरकी ओर भागी, उस वर्णनको स्थान दिया है। परन्तु अनुमान समयका वर्णन है कि जिन ललनाप्रोको' होता है कि प्रारम्भसे भारती प्रार्य कभी सूर्यतकने नहीं देखा, व ललनाएँ क्षत्रियों में यह रीति न रही होगी। भारती अब बाहर निकलकर भागने लगीं । कथाके भिन्न भिन्न प्रसङ्गोंके चित्र यदि इससे जान पड़ता है कि राजाओंकी दृष्टिके सामने रखे जाये तो बात होगा विवाहित स्त्रियाँ पर्दमें रहती थी । इसी कि अति प्राचीन कालमें यह पर्दा न रहा तरह जब हस्तिनापुरसे स्त्रियाँ जल-प्रदान . होगा। सुभद्रा, रैवतक पर्वत पर, यादव करनेको गङ्गा जानेके लिये निकलीं, तब स्त्रियों के साथ खुले तौर पर उत्सवमें फिर भी यही वर्णन किया गया है कि जिन फिरती थी, इसी कारण वह अर्जुनकी स्त्रियोंको सूर्यने भी न देखा था, वे अब । दृष्टि में आ गई । घृतके समय द्रौपदी धृत- खुले तौर पर सबकी नज़रके आगे (बेपर्द) गएकी स्त्रियों में बैठी थी। वहाँ पर यदि आ रही है। इससे भी पूर्वोक्त अनुमान दुश्शासन या प्रातिकामी दुतके लिए पर्दा होता है। किन्तु इसमें थोड़ासा विचार होता तो वह वहाँ पहुँच न सकता। और, है। स्त्री पर्वके १०वें अध्यायमें यह वर्णन । इसी प्रकार द्रौपदी भी भरी सभामें न है-"प्रत्यक्ष देवताओने भी कभी जिनके । लाई जा सकती। वनवासमें द्रौपदी बुल्लम- नाखुनोतकको नहीं देखा वे ही स्त्रियाँ, खुल्ला पागडवोंके साथ थी और जयद्रथमे अनाथ होनेके कारण, लोगोंको दिखाई दे उसे दरवाज़में खड़ी देखकर हरण करने. रही हैं।" इस वाक्यसे अनुमान होता है कि का प्रयत्न किया था। ऐसे ऐसे अनेक उदा. जिन स्त्रियोंके पति जीवित होते थे वे ही हरणोंसे हमारा मत है कि भारती युद्ध के पर्दे रहा करती थीं । परन्तु अनाथ अर्थात् समय क्षत्रिय स्त्रियों के लिए पर्देका बन्धन विधवा स्त्रियाँ बाहर जन-साधारणमें न था। साधारण गीतिसे वे बिलकुल बाहर निकलती थी। इसमें सन्देह नहीं कि 'मती फिरती नहीं थी, किन्तु वर्तमान