पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/२४६

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महाभारतमीमांसा

- -- --- - -- -- २२० ॐ महाभारतमीमांसा # विषयक कल्पना, बहुत पहले, उच्च स्थितिमें बन्द है । इतिहाससे मालूम होगा कि पहुँच चुकी थी । महाभारतके अनेक दुनियाके परदेपर अनेक जातियोंके उदाहरणों और कथानकोंसेार्य स्त्रियोंके बीच सिर्फ दो ही आर्य जातियों में पुनर्वि- पातिव्रत्यकेसम्बन्धमें हमारेमन परादर- वाहका रास्ता रुका पडा है-हिन्दुस्थानके की अद्भुतछाप लग जाती है। इस प्रकारका भारतीय पार्योंमें और पश्चिममें जर्मनोंकी मारती आर्य स्त्रियोंका उदार चरित्र और एक शाखामें। रोमन इतिहासकार देसि. किसी जातिवालोंमें देखनेको न मिलेगा। टस जर्मनोंका वर्णन करते हुए लिखता "स्त्रीणामार्य-खभामानां पतिरेकोहि दैव-है-"कुछ जर्मनोंकी खियाँ जिन्दगी तम्" । उस समयकी आर्य स्त्रियोंके भरके लिये एक ही पतिको अपनाती हैं. वर्णनसे यह धारणा स्पष्ट देख पड़ती है । और उसे अपने जीवनके सुखका सर्वस्व कि 'आर्य स्त्रियोंका एक मात्र देवता पति निधान समझकर उससे अत्यन्त प्रेम ही हैं । इस सम्बन्धमें सावित्रीका करती हैं ।" इससे ज्ञात होता है कि पाख्यान मानों हमारे आगे पातिव्रत- पातिव्रतको उदात्त कल्पनासे यह प्रणाली, धर्मका अत्यन्त उदात्त, मूर्तिमान् , सुन्दर । भारतीय पार्योकी तरह, प्राचीन जर्मनों- चित्र महाभारतमें खड़ा किया गया है । की शाखामें भी प्रचलित हो गई थी। लगातार हज़ारों वर्षसे हिन्दू स्त्रियोंके यूनानी इतिहास-लेखकोंके वर्णनसे भी अन्तःकरण पर उसका पूर्ण परिणाम मालूम पड़ता है कि भारतीय आर्यों में हो रहा है। द्रौपदी, सीता और दमयन्ती पुनर्विवाहकी मनाही बहुत प्राचीन काल- आदि अनेक पतिव्रताओंके सुन्दर चरित्र, ! से महाभारतके समयतक रही होगी। हजारों वर्षसे हम हिन्दुओंकी ललनाओंकी सिकन्दरके साथके इतिहासकार लिखते नज़रोंमें-महाभारतकी कृपासे घूम रहे हैं कि पञ्जाबके पार्यो में पुनर्विवाहकी रीति हैं। इस कारण पातिव्रत हिन्दू स्त्रियोंका नहीं है, और वे यह भी कहते हैं कि इस अवर्णनीय अलङ्कारसा हो रहा है। हिन्दु गतिको इन लोगोंने सिर्फ इसलिये समाज पर महाभारतने जो अनेक चला दिया है जिसमें स्त्रियाँ अपने पतिको उपकार किये हैं उनसे पातिव्रतका वर्णन विष देकर दुसरंकी न हो जाये । इसमें बड़ा अनोखा है। स्त्रियोंके पातिव्रतका सन्देह नहीं कि इस अद्भुत कारण पर जो अतिशय उदात्त स्वरूप-इस ग्रन्थमें- ज़रा भी विश्वास नहीं किया जा सकता। वर्णित है वह एक बहुत बड़ा उपकार है महाभारतकी एक कथामें इस मनाहीका और इसे हिन्दू-समाज कभी भूल नहीं । उद्गम है। वह कथा यो है:-दीर्घतमा सकता। ऋषि अन्धा था। उसकी स्त्रीका नाम था पुनर्विवाहकी रोक। । प्रद्वेषी । वह, ऋषिके लिये और ऋषि- कुमारोंके लिये काम करते करते, ऊबकर, पातिव्रतकी उच्च कल्पनाके कारण उन्हें छोड़कर जानेको उद्यत हुई। तब मार्य लोगों से सिर्फ नियोगकी प्रथा : ऋषिने कहा कि भाजने मैं ऐसी मर्यादा नहीं उठ गई, बल्कि पुनर्विवाहकी रीति । बनाता है कि जन्म भरके लिये स्त्रीका भी इसी कारणले आर्य लोगोंमें-त्रैवर्णि- एक ही पति रहे । पति जीषित हो या न कोमे-बन्द हो गई । भारतीय प्रायोंमें हो, स्त्री दूसरा पनि कर ही न सकेगी। प्राचीन कालसे पुनर्विवाहका चलन यदि वह पति करेगी तो पतित हो जायगी।