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महाभारतमीमांसा

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  • महाभारतमीमांसा

थी। इस वर्णनसे पता लगता है कि कुमार विद्या पढ़नेके लिए आकर रहे आश्रममें कौन कौनसी विद्याएँ पढ़ाई थे। धनुर्विद्यामें द्रोण बहुत ही निष्णात थे जाती थी और किन किन विषयों पर और कृपाचार्यकी तरह उनकी भी प्राचार्य बहस होती थी। जान पड़ता है कि विद्या- पदवी थी। परन्तु दरिद्र होनेसे अथवा पीठ कुछ लिखाने-पढ़ानेके स्थान न थे। द्रुपदसे बदला लेनेकी इच्छासे उन्होंने ये स्थान तो पढ़े-पढ़ाये लोगोंको अपनी राजसेवा स्वीकार कर ली थी। विद्वत्ताको परीक्षा देने अथवा पढ़ी हुई साधारण रीतिसे गुरुकेही घर शिष्य- अपनी विद्याको सदा जाग्रत रखनेके लिए | के रहनेका रवाज था और वहाँ रहते होंगे। असली शिक्षा (पढ़ाई) तो भिन्न भिन्न समय शिष्य जो भिक्षा माँग लावे वह गुरुओंके ही घर दस-दस पाँच-पाँच गुरुको अर्पण करके फिर अपनी गुज़र . विद्यार्थियों में होती थी। करे । अर्थात् गुरु और शिष्य दोनोंको ही ___जहाँ कौरव-पाण्डवोंके सदृश अनेक शान्त एवं समाधान वृत्तिके होना पड़ता विद्यार्थी एक ही जगह रहते होंगे वहाँ था (शां० अ० १६१)। यह बहुधा ब्राह्मण सबको गुरुके घर न भेजकर कोई न कोई विद्यार्थियोंका और वेदविद्या पढ़नवालो- स्वतन्त्र शिक्षक नियुक्त कर लेनेको गति का सम्प्रदाय रहा होगा। प्रत्येक विद्यार्थी- रही होगी। इस कारण, गुरुके पद पर को अलग अग्नि रखकर प्रातःकाल और द्रोणकी योजना हस्तिनापुरम कर लेनेका सन्ध्या समय उसकी पूजा करनी पड़ती वर्णन है। इन सब लड़कोंने पहले कृपा श्रीमति अध्यायमें यह चार्यसे वेद-विद्या और अस्त्र-विद्या सीखो भी कहा है कि 'उभे सन्ध्ये भास्क- थी। परन्तु इधर द्रोण थे भरद्वाजके पुत्र, और साक्षात् परशुरामसे उन्होंने अपराग्निदेवतान्युपस्थाय'-सुबह-शाम विद्याकी शिक्षा पाई थी: द्रपदस नागज सूर्य, अग्नि और अन्य देवताओंकी होकर वे अपने साले कृपके पास आ रहे स्तुति कर और तीन बार स्नान करके थे। इसलिए भीष्मने उनकी योग्यता (त्रिषवणमुपस्पृश्य) गुरुके घर स्वा- अधिक देखकर सब राजपुत्र उन्हींके ध्यायमें तत्पर रहे । अर्थात् , इनने कठोर अधीन कर दिये । अर्थात् द्रोणको व्रतका सध जाना ब्राह्मणोंके ही लिए उन्होंने राज्यमें नौकर रख लिया और सम्भव था, और वह भी सब ब्राह्मणोंके गृह-धन-धान्य आदि सम्पत्ति उनको दे लिए नहीं। क्षत्रिय और वैश्योंके लिए दी । स्पष्ट है कि यह घटना सदाकी परि- भी यही नियम था: किन्तु स्मृतियों- पाटीके विरुद्ध हुई । एक तो राजपुत्रोंके से पता लगता है कि उनके लिए भिक्षा- दुहरे गुरु हो गये: दुसरे जहाँ गुरुके घर का नियम न था। क्षत्रियोंको धनुर्विद्या शिष्य रहते थे, वहाँ गुरु ही शिष्योंके और राजनीति अथवा दण्डनीति भी धर-निदान शिष्योंके सहारे राज्यमें- ब्राह्मण ही सिखाते थे और वैश्यों को भी श्रा रहा। यह बात अत्यन्त धनवानों और वार्ताशास्त्रका ज्ञान अथवा शिल्पका ज्ञान राजपुत्रोंके हो लिए थी। यह तो प्रकट ब्राह्मण गुरुत्रोंसे ही मिलता था । फिर ही है कि इस अवस्थामें शिष्यको घर भी यह अनुमान होता है कि इन विद्या- छोड़कर दूर नहीं रहना पड़ता। लिखा ओंकी शिक्षा देनेवाले लोग राज्यकी अोर- है कि द्रोणके पास अन्य देशोंके गज. · से भी नियुक्त रहते होंगे और उनका मुख्य