पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/२२७

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  • आश्रम-व्यवस्था।

२०१ - - मन तैयार हो जाय तब, परमेश्वरका है ही । उसके विषयमें विशेष कुछ चिन्तन करनेमें श्रायु बितानेके लिये, जो कहना नहीं है। किन्तु गृहस्थाश्रमका चौथा श्राश्रम ग्रहण किया जाय वही दसरा मख्य भाग था अनिकी सेवा संन्यास है। चारों आश्रमोका यही स्थल करना। अग्निका आधान करके नित्य खरूप था। यजन करना गृहस्थाश्रमका मुख्य कर्तव्य अब देखना चाहिये कि आश्रमोंके है। जान पड़ता है कि इस कामको वर्णनमें ऊपर जो बातें लिखी गई हैं उनका ब्राह्मण लोग बहुधा किया करते थे। वास्तव में उपयोग होता था या नहीं। यह कहने में भी कोई हानि नहीं कि और महाभारतके समय किन किन लोगों- क्षत्रिय भी किया करते थे। महाभारतमें को उनका पालन करनेकी अनुमति थी। लिखा है कि श्रीकृष्ण जब समझौता करने महाभारत और उपनिषदोंके अनेक के लिये गये तब, विदुरके घर, सभामें वर्णनोंसे देख पड़ता है कि गुरुके घर रह- जानेके पहले-सवेरे नहा धोकर उन्होंने कर ब्रह्मचर्याश्रममें विद्या प्राप्त करनेका जप-जाप्य किया और फिर अग्निमें आहुति काम पूर्व समयमें बहुधा ब्राह्मण विद्यार्थी दी । (उ० अ० ६४) लिखा है कि वसुदेव- किया करते थे । ऋषियोंके यहाँ का देहान्त होने पर उसका क्रियाकर्म बड़ी बड़ी शालाएँ होती थीं। उनमें करते समय रथके आगे अश्वमेध-सम्बन्धी ब्राह्मण विद्यार्थी अपना उदरनिर्वाह छत्र और प्रदीप्त अग्नि पहुँचाये गये थे। भिक्षा द्वाग अथवा अन्य रोतिसे करके, इसी प्रकार पाण्डव जब वनवासमें थे विद्याभ्याम करते थे। महाभारतसे ठीक नब उनके गृह्याग्निका सेवन नित्य होते ठीक पता नहीं लगता कि क्षत्रियों अथवा रहनेका वर्णन है । जिस समय पाण्डव वैश्योंके बालक विद्या पढ़ने के लिये गुरुके महाप्रस्थानको गये, उस समय उनके घर जाते थे या नहीं। हरिवंश और गृह्याग्निको जलमें विसर्जन कर देनेका भागवतमें वर्णन है कि उज्जैनमें गुरुके वर्णन है। सारांश यह कि भारती युद्धके घर रहकर श्रीकृष्णने विद्या पढ़ी थी। समयके सभी क्षत्रिय गृह्याग्नि रखते थे। पाण्डवों और दुर्योधन श्रादिने तो अपने घर यह बात बिलकुल स्पष्ट है । यह बतलाने- पर ही विद्या पढ़ी। विद्या पढ़ाने के लिये के लिये कोई साधन नहीं कि महाभारत- द्रोणाचार्यजी इनके घर ही रख लिये गये कालमें अर्थात् सौतिके समय क्या व्यवस्था थे। ब्रह्मचर्याश्रमका एक मुख्य भाग, थी। तथापि यह मान लेनेमें कोई हानि अर्थात् गुरुके घर रहना, घट गया था; नहीं कि जब अग्निकी सेवा बड़ी झम्झट- और उसके बदलेमें यह दूसरी रीति चल की हो गई थी तब अनेक क्षत्रिय अग्नि- पड़ी थी। धीरे धीरे भिन्न भिन्न क्षत्रियों विरहित हो गये होंगे। यह बात भी नहीं और वैश्यों में ब्रह्मचर्याश्रमकी महत्ता घट कि सभी ब्राह्मण अग्नि-सेवा किया करते गई और महाभारतके समय आजकलकी थे उनमेसे कुछ लोगोंने इसे छोड़ दिया तरह सिर्फ उपनयन संस्कार बाकी रह होगा। कहा गया है कि अग्नि न रखने- गया होगा। अब ग्रहस्थाश्रमको देखना वाले ब्राह्मणोंके साथ शुद्रका सा बर्ताव है। गृहस्थाश्रमकी मुख्य विधि विवाह है किया जाय । अब रह गया गृहस्थाश्रमका जिसका लुप्त होना कभी सम्भव नहीं। तीसग अङ्ग अतिथि-सेया, सो इसे सभी वह तो सब वर्गों में और सभी जातियों में करते थे। गृहस्थाश्रमका दरवाज़ा सबके