पृष्ठ:महाभारत-मीमांसा.djvu/२१३

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.8 वर्ण-व्यवस्था । परवा न करके हीन कर्मका त्याग कर दे। के बाहर विवाह करनेकी मनाही थी, ऐसा करनेसे उसकी गणना उत्तम पुरुषोंमें उसी प्रकार यह भी नियम था कि होने लगेगी। इसके विपरीत, यदि जाति जातिका पेशा छोड़कर दूसरा पेशा न तो उच्च हो परन्तु कर्म हो हीन, तो उस करना चाहिये । तब, प्रत्येक जातिके मनुष्यको हीनता प्राप्त होती है।" तात्पर्य लिये कौन पेशे मुकर्रर थे और उनके यह है कि यहाँ कर्मकी प्रशंसा योग्य लिये कोई अपवाद भी थे या नहीं,- रीतिसे की गई है, परन्तु साथ ही जाति. इस सम्बन्ध विचार करनेसे अच- की जन्मसिद्धता भी माम्य की गई है। : रज होता है कि जो अपवाद विवाहके यहाँ पर प्रश्न किया है कि-"अनेक ऋषि सम्बन्धमें था वही पेशेके सम्बन्धमें भी हीन जातिमें उत्पन्न होकर भी श्रेष्ठ वर्णमें था । यह कड़ा नियम था कि कोई कैसे पहुंच गये ? अपने ही जन्ममें उत्तम वर्ण, आपत्कालमें, अपनेमे नीचे वर्णका वर्ण कैसे पा गये?" इसका उत्तर इसी कोई व्यवसाय कर ले: यानी अनुलोम अध्यायमें है कि-"मुनियोंने अपने तपके व्यवसाय कर ले । पर वह अपनेसे ऊपर- सामर्थ्यसे मनमाने क्षेत्रमें वीजारोपण वाले वर्णका व्यवसाय न करे अर्थात् करके अपनी सन्तानको ऋषित्व पर प्रतिलोम व्यवसाय न करे। चारों घोंके पहुंचा दिया ।" अर्थात् महाभारत-प्रणेता व्यवसाय महाभारतमें भिन्न भिन्न स्थलोमें यह कहते हैं कि पुराने ऋषियोंका उदाह- कथित हैं। संक्षेपमें वे यों है:-ब्राह्मणके रण देना न्याय्य नहीं है। सारांश यह है छः काम थे। पठन-पाठन, यजन-याजन, कि सौतिके समय वर्ण और जातियाँ दान-प्रनिग्रह । इसमें ब्राह्मण षटकमीका अभेद्य हो गई थीं: और ब्राह्मण श्रादि अधिकारी कहा जाता था। क्षत्रियके वों में उत्पन्न होनेवाले ही अपने अपने लिए यजन, अध्ययन और दान करनेकी उत्पादक बापके वर्णके माने जाते थे। 'स्वाधीनता थी: उसका विशेष कर्म प्रजा- , पालन और युद्ध था। वैश्योंको भी उक्त पेशेका बन्धन । तीन कर्म करनेका अधिकार था और इस प्रकार यहाँतक वर्ण-व्यवस्थाके उनके लिए तीन विशेष काम-कृषि, प्राचीन स्वरूप पर विचार किया गया। गोरक्षा और वाणिज्य थे। शुद्रीका काम इस बातका भी विचार किया गया कि सिर्फ एक ही-तीनों वर्गीकी शुश्रूषा विवाहके कौन बन्धन किस प्रकार उत्पन्न , करना था। उनके लिए अध्ययन, यजन हुए; प्रारम्भमें, वैदिक कालमें, वर्ण- और प्रतिग्रह बन्द थे । यहाँतक कि शद्र- व्यवस्थाका कैसा स्वरूप रहा होगा; तथा वर्ण आर्य-वर्णके बाहर था । वेदके सौतिके समय अर्थात् महाभारतके अध्ययन करनेका अधिकार त्रिवर्ण समय उसकी क्या दशा थी । अब इस अर्थात् आर्योको ही था । वैदिक संस्कारों- वर्ण-व्यवस्थाका दूसरा पहलू देखना है का अधिकार भी इन्हींको था। इससे और इस बातकी खोज करनी है कि स्पष्ट देख पड़ता है कि आर्योका वंश किस वर्णको कौन कौन व्यवसाय करने जुदा था और उनकी नीति तथा सभ्यता का अधिकार अथवा स्वाधीनता थी । यह एवं जेताकी हैसियतसे उनके अधिकार तो पहले ही लिखा जा चुका है कि जाति- 'भिन्न थे। श द्रोको उन्होंने समाज-व्यवस्था- के मुख्य बन्धन दो है। जिस प्रकार जाति- : में ले लिया: पर यह काम उन्होंने सिर्फ