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महाभारतमीमांसा

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में उच्च थे: शद्र धर्णसे यदि उनका सङ्कर । प्राचार और पवित्रताको सिरजा । इसके हो तो उनकी सन्तान आचरणमें भी नीच पश्चात् मनुष्यों के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और होगी । इसलिये यह नियम हो गया कि शुद्र वर्ण तथा सत्वादि गुणोंसे युक्त अन्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, शुद्रा स्त्रीको प्राणिवर्णोके वर्ण उसीने उत्पन्न किये । प्रहण न करें। इस नियमके बन्धनकी ब्राह्मणोंका वर्ण (रङ्ग) शुभ्र है, क्षत्रियोंका न्यूनाधिकताके कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय लाल, वैश्योंका पोला और शूद्रोंका काला और वैश्यों में भी दिन पर दिन अधिक होता है ।" यह कहकर एक शङ्का खड़ी भेद बढ़ता गया । ब्राह्मणोंका आचरण कर दी है कि-"ब्राह्मण आदि चार वर्णों- अत्यन्त श्रेष्ठ था, इस कारण समाजमें उनके में परस्पर जो भेद है, उसका कारण यदि प्रति आदर बढ़ने लगा । ब्राह्मणोंकी ' श्वेतादि वर्ण (रङ्ग ) हो तो फिर सभी शान्ति, उनका तप और संसारसे उनकी वर्ण सङ्कीर्ण हैं : क्योंकि प्रत्येक वर्णमें विरक्ति आदि गुणोंने उनके वर्णको श्रेष्ठ भिन्न भिन्न रङ्गोवाले आदमी मिलते हैं । कर दिया । इस प्रकार चातुर्वर्यकी सिर्फ रङ्गसे ही वर्ण-भेद नहीं माना जा ऐतिहासिक उत्पत्ति देख पड़ती है । सकता और कारणोंसे भी वर्णमें भेद ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और श द्र, चारों नहीं माना जा सकता : क्योंकि ब्राह्मण वर्ण, आनुवंशिक स्वभावके कारण उत्पन्न आदि सब वर्गों पर काम, क्रोध, भय, हुए और उनमें प्रतिलोम विवाह पर तो लोभ, क्षोभ और चिल्लाका एकमा ही स्वास नजर रक्खी गई । ब्राह्मण स्त्रीकी असर है। फिर वर्ण-भेद रहनेका क्या शद्र पतिसे उत्पन्न सन्तान अत्यन्त निन्द्य कारण है ? ब्राह्मण आदि सभी वर्णवालों- समझी जाकर चागडालोंमें मानी गई। इसी के शरीरसे पसीना, पेशाब, मल, कफ, प्रकार क्षत्रिय स्त्रीकी शुद्र पुरुषसे उपजी पित्त और रक्त एक ही सी गतिसे बाहर हई सन्तति धर्मवाहा निषाद मानी गई। निकलते हैं: फिर वर्ण भेद माननेकी ज़रू- ऊपरके तीन वर्णोंमें प्रतिलोम विवाहसे : रत?" भृगुने इसका यह उत्तर दिया उत्पन्न सन्तान भिन्न जातिकी नो मानी है-"सारा संसार पहले ब्राह्मण ही था: गई, परन्तु ऊपर बतलाई हुई श द सन्तति- : किन्तु कर्मके अनुरोधसे उसे. वर्णका की तरह धर्मबाह्य नहीं समझी गई । इस : स्वरूप प्राप्त हुआ। ब्राह्मणोंमें जो लोग प्रकार वर्गों और भिन्न भिन्न जातियोंकी रजोगुणी थे, वे विषय भोगनेकी प्रीति, उत्पत्तिका पता ऐतिहासिक रीनिसे क्रोध करनेकी श्रादत और साहस-कर्मके मिलता है। अब यह देखना है कि महा- प्रेमके कारण क्षत्रिय हो गये। रज और भारतमें वर्णोकी कैसी उपपत्ति बतलाई है: तमके मिश्रणके कारण जो ब्राह्मण पशु- और फिर ऊपर लिखी हुई उपपत्तिके पालन और खेतीका रोज़गार करने लगे, साथ उसका मेल मिलाया जायगा। वे वैश्य बन गये और जो तमोगुणी होने- महाभारतका सिद्धान्त । । के कारण हिंसा तथा असत्य पर आसक्त हो गये तथा मनचीते कामों पर उप- शान्ति पर्वके १८८ व अध्यायमें वर्णन : जीविका करने लगे, वे शुद्ध हुए । मत- किया गया है कि-"ब्रह्माने पहले ब्राह्मण लब यह कि कर्मके योगसे एक ही ही उपजाये, और फिर उनको स्वर्ग-प्राप्ति जातिके भिन्न भिन्न वर्ण हो गये"। इस होनेके लिये उसने सत्य, धर्म, तप, वेद, विवेचनमें वर्णकी उपपत्ति सत्त्व, रज